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नेता जी-माधुरी-कुमारी-318

उम्र कम है, मेरी
शायद तजुर्बे भी कम हो,
थम गए पाँव, इस क्षण
मिथ्य ऐश्वर्य के पथ पर
अत्यंत उमंग से, निभाते
उफ़ ये चुनावी रिश्ते ,नेता जी
टूटी सड़के,बिखरे अरमान
इस बीच इठला रही
पुल गुण-गाथाओ की
ना जाने क्या-क्या कर जाते
एक कुर्सी के लिए ,नेता जी
अक्सर ऐतवार कर जाती जनता
कुछ झुठे कुछ सचे वादों पर
ऐतवार करना ही पडता है, जनाब
चेहरों पर फितरत कहां लिखी होती हैं।
अल्हड की भाती हमने भी
ऐतवार किया क्यो,नेता जी
सँवरता नही, समाज बेईमानीयों से
प्रज्ज्वलित हो उठी प्राणो मे सैलाब की ज्वाला
कुरीतियो के कंटक निष्प्रभ हो चले
क्यो नेता जी

(माधुरी कुमारी)

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