पलकों के सपने-जोगेन्द्र कुमार गुप्ता

पलकों के सपने-जोगेन्द्र कुमार गुप्ता

सपने पलकों के घरोंदे में रहते है, ये सपने है !
पलकों घरोंदे में पलते है, ये सपने है !
जैसे ही पलकें खुल जाते है वैसे ही सपने उड़ जाते है,ये सपने है !
सपने सिर्फ सपने होते है और बंद पलकें में अपने होते है, ये सपने है !
जाते जाते गमो को भेज देते है और इन गमो से पलकें भिगो कर दूर खड़े हस्ते है, ये सपने है !
सपने टूटा शीशा है जैसे आँख खुलते ही वैसे सपने टूट जाते, ये सपने है !
सपने बूझता दिया है, ये सपने है !
सपने भूंकम, आंधी के झोंके , पानी की हल-चल की तरह है, ये सपने है !
सपने टूटता तारा है, ये सपने है !

 

जोगेन्द्र कुमार गुप्ता

भोपाल , मधय परदेश

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