पापा खो गए-नुजहत राना रूही

पापा खो गए-नुजहत राना रूही

वह बचपन के रंगीन सपने,
वह नादानियाँ भरी ठिठोलियाँ,
कई बार मचलना, कई बार झिझकना
निराशाओं के बादलों के घुटन से दुबकना
सभी यादों के परदे पर उभरते हैं।
उन झणों में पापा का,
स्नेह भरा स्पर्श का एहसास,
न हारने की मनसा देते सीख,
कंधों को छू हौसला बढ़ाते थपकियाँ,
वह आँखों से मरहम की फाहे रखना,
थककर उनके कंधों से लटकना,
सब याद आते हैं ।
वह अपनी गलतियाँ,
जिन्हें वह चंद झणों में दुरसत करते,
हर लड़खड़ाते कदम को संभाल देते,
पर ……. अब जो
थक बहुत गई हूँ ।
हौसला अफ़जाई के लिए कोई नहीं,
आँखें हैं नम ,
मचलती है फड़कने को,
पर मज़बूत गगन अब नहीं….
दुःख भरे अपने मन का सागर,
किस जटा में उतार आऊँ ?
पापा तुम इस भीर भरे जग में,
कहाँ खो गए ?

 

               नुजहत राना रूही
                   सऊदी अरब

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