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पापा की परी-वेद-प्रकाश

कभी मां कभी बहन कहकर नारी को सम्मान देते हो

मिलते ही अकेले सुनसान राहों में  दुपट्टा खींच लेते हो

नकाब ओढ़ के बैठा जमाना डरू आखिर मै किस  किस से

यकीनन खौफ कुछ कम नहीं है नजदीकी रिश्तों से

कोई खड़ा हैं एसिड लिए राहों में मेरी

बिगाड़ दुंगा सूरत तेरी जो हुई ना मेरी

कोमल तन हैं करुणा से भरी हूं आंखो में आंसू लिए खड़ी हूं

दामन में दाग लगाओ ना मेरी मै अपने पापा की परी हूं

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