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परिवार, सपने और वक्त-उजाला-बाथम

कभी-कभी ऐसा वक्त आता है
के
हम अपने अपनों को वक्त ही नहीं दे पाते हैं..
क्योंकि
मैंने अपनों से ही सीखा है,
कि हम बेटा अपने हैं..
तो हम उनकी इस बात को मद्देनजर रखते हुए,
हम बेशक वक्त ना दे लेकिन
दिल में अपनों का साथ और
जेहन में अपनों की बात लेके
हम अपने लक्ष्य में थोड़ा व्यस्त हो जाते हैं….
क्योंकि मैंने अपनों से ही सीखा है की
हम साथ हैं बस तुम पीछे मत हटना

हम जानते हैं कि हमारे अपने हमारी फिक्र करते हैं
क्योंकि
हम अपनों के साथ वक्त बिताकर जो हमारी आने वाली लक्ष्य में हमारी जिंदगी के हर मोड़ पर काम आने वाली बातें, संस्कार , और उनके जो विचारों के माध्यम से जो हम सीखते हैं हमारे अपनों के साथ में हम रोजाना वक्त बिताते हैं..
वह अचानक से बंद हो जाए
तो शायद हमारे अपने सोचते हैं
कि उनके बच्चे उनसे नाराज हैं..
पर ऐसा नहीं होता है,
हम उनसे हरगिज़ नाराज नहीं होते हैं..
बस
हम अपने लक्ष्य की ओर व्यस्त हो जाते हैं
ताकि भविष्य में जो हमारे,
अपनों ने हमारे लिए सपने देखे हैं..
उन सपनों को पूरा करने के लिए बस हम लग जाते हैं..
यह हमारी नाराजगी नहीं होती है,
हम इसलिए वक्त नहीं दे पाते..
कि हम अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए,
मेहनत करने में लग जाते हैं
कि आगे चलकर हमारे अपने हमसे नाराज ना हो सके..
लेकिन जब हमारे अपने बड़े ही यूं मायूस होंगे
तो हमें शक्ति ,धैर्य ,लगन खुद पर आत्मविश्वास कैसे आएगा..?

कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि
हमारे अपने बड़े बिल्कुल
छोटे – बच्चे जैसे प्रतीत होते हैं..
हमें तो समझाते हैं पर खुद,
अपने बच्चों से बात ना होने पर खुद ही बच्चों की तरह रूठ जाते हैं।

उजाला बाथम
( मेरे चाचा जी को समर्पित)

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