पत्थरबाज़ लुटेरा-दीप जांगड़ा

पत्थरबाज़ लुटेरा-दीप जांगड़ा

मैं वतन का सिपाही ओर वो बेरहम पत्थरबाज लुटेरा था
कितनी बार उस बेग़ैरत ने करी चढ़ाई ओर मुझे घेरा था

मैं चलता रहा अपने फ़र्ज़ की राह पर लड़खड़ाता रहा
अपनी बंदूक को सीने से लगाये मैं सहमा सा जाता रहा
थी गोलियां बहुत मेरे बस्ते में अग़र चलाता तो जीत जाता मैं
पर अपने वतन के भटके भविष्य को कैसे छलनी बनाता मैं
आज अगर अँधेरी रात है यहां आने वाला सुहाना सवेरा था
कितनी बार उस बेग़ैरत ने करी चढ़ाई ओर मुझे घेरा था

एक एक निशाँ जो मेरे माथे पे लगा वो ज़ख्म भी भर जाएगा
धीरे धीरे होगी सुबह ग़म का अंधेरा बादल भी टल जाएगा
जूनून है ये जवानी का क्या अच्छा क्या बुरा मालूम नही है
अंधेरे में हैं वतन का भविष्य कौन दुश्मन, दोस्त मालूम नही है
ये वो बीज पनप रहा है जो दुश्मनों ने मेरे आँगन में बिखेरा था
कितनी बार उस बेग़ैरत ने करी चढ़ाई ओर मुझे घेरा था

मौत का मंजर अगर दिखाऊँ तो सक्षम हूँ मैं अपने कर्म में
सिपाही हूँ ना मैं बस बंधा हुआ हूँ देशभक्ति के सच्चे धर्म में
देख सकता हूँ मैं अपनों को क्या हुआ जो आज वो पराये हैं
सियासत के कुछ नुमाइंदे ही तो हैं जिन्होंने माहौल गरमाये हैं
एक एक राज़ दफ़न है सीने में जो उस दुश्मन ने उकेरा था
कितनी बार उस बेग़ैरत ने करी चढ़ाई ओर मुझे घेरा था

पुलवामा का वो वाकया ओर मुझे ओरंगजेब भी याद है
मुझे पहले धरती माता मेरा धर्म और बाकी सब बाद है
मैं जीता हूँ देश की खातिर इज्जत के लिए मर भी जाऊंगा
तुमने एक सर काटा था धोके से मैं चार काट कर लाऊंगा
भूल गया है क्या दुश्मन जब तेरा जिस्म गोलियों से उधेडा था
कितनी बार उस बेग़ैरत ने करी चढ़ाई ओर मुझे घेरा था

मैंने तो हमेशा जलाया है “दीप” अमन का इस गुलिस्तां में
जरा गौर फरमाना नही है कमी हौंसलों की हिन्दुस्तां में
दूध के बदले खीर देने में विश्वाश है हमें सुन पाक ए नापाक
कश्मीर की तरफ आंख उठी तो कर के भी दिखाएंगे तुझे ख़ाक
भूल गया क्या कारगिल से कुत्तों की तरह खदेडा था
कितनी बार उस बेग़ैरत ने करी चढ़ाई ओर मुझे घेरा था

दीप जांगड़ा

Deep Jangra

मैं दीप जांगरा कैथल हरियाणा का निवासी हुँ। मैं वीर रस का कवि हूँ।

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