पिता का साया – आराधना सिंह

पिता का साया – आराधना सिंह

नन्ही उंगलियों को पकड़ कर चलना उसी ने सिखाया है,
प्यार तो है ही उसका और ममता का सागर भी लुटाया है,
डाँटता था कभी कभी वह पर नेक राह उसी ने दिखाया है,
फिक्र नही उसे किसी काम की फिक्र तो उसे मेरा है,
मुझे ऊँचाईयों पर ले जाने के लिए उसने बनाया नया सबेरा है।
मौसम तो अक्सर अपना रंग बदलता रहता है,
पर उसका तो एक ही रंग है,
दुःखो का सिकन होता है चेहरे पर लेकिन फिर भी मुस्कुराता है,
देखे तो लगता है मानो यही उसके जीने का ढंग है।
कहानिया सुनाते हुए मुझे न जाने कब वह भी सो जाता है,
करवट बदलते हुए जब हाथ फेरू तो वह रहता नही न जाने कब वह अपने करमो मे लग जाता है।
जिसको जब तकलिफ लगी सब ने रब को पुकारा है,
मुझे कभी तकलिफ की हवा भी नही लगी क्योंकि मैने अपना सर हमेशा उसके चरणो मे झुकाया है।
दुआ आैर आशिष के लिए हमेशा उठता उसका हाथ है
छोड़ दो सारे तीरथ पर जाना क्योंकि वही जगन्नाथ है
यह सब बाते है हमारे पिता की जिन्होने हमे दिया सुखो का छाया है
मै कहीं भी रहुँ मेरे दोस्त मेरे साथ मेरे पिता का साया है।

Aradhna singhआराधना सिंह
गुजरात सुरत

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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