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पक्षी-संतोष कुमार कोली

पर फैलाता, अनंत नील गगन में।
परवान चढ़, आसमाॅऺ नापता खुली पवन में।
लहराता, इठलाता, हवा में करता कलोले।
मेरा मन, तेज़ उडूॅऺ,या हौले- हौले।
कभी हवा के साथ,कभी हवा में गोता।
काश! मैं पक्षी होता।
कभी इस डाल, कभी दूसरी डाल से रिश्ता जोड़ता।
छोड़ डाल,पकड़ ली मंजरी,हवा में झूला झूलता।
आम चख, निबौरी खाऊॅऺ, नज़र गई कनेर पर।
बौर बहुत बुरा लगे,भा गई सूखी टहनी मुॅऺडेर पर।
माली से, आँख मुॅऺदाई में खोता।
काश! मैं पक्षी होता।
न जोड़ना, न छोड़ना, न ही चिंता कल की।
रिश्तों का गुंफन नहीं, न चिंता कर्म व फल की।
मनमौजी,अलमस्त, सुर सुरीली तान।
मैं, मेरा डैना, किसी से न लेना देना,है तो सारा जहान।
मैं, मेरा साथी एक डाल, वह गगन खेलता सोता।
काश! मैं पक्षी होता।
न सीखा- सिखाया, न बना -बनाया, मन की ही बोलता।
पंख फैला अपने साथी से, दिल की खिड़की खोलता।
रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत,पेट भरता।
मैं पक्षी का पक्षी रहता, पक्षी योनि पर नाज़ करता।
यदि मनुष्य, मनुष्य ही रहता, तो आज इतना नहीं रोता।
काश! मैं पक्षी होता।

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