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प्रेम गीत-अभिषेक पाठक

प्यार में चलके मैं थक गया हूं प्रिये ,जुल्फ की छांव में मुझको विश्राम दे।
मैं हूं राही भटकता रहा जिस लिए, सूर्य ढलने को है वह ह सीं शाम दे।
ऐ उजालों जरा; वस्त्र को डालिए, हर किसी को नहीं रौशनी चाहिए।
चैन भी दे सके रैन भी दे सके, जिंदगी को एक ऐसा धनी चाहिए।
कंठ मेरे तेरे रो लिए हैं बहुत ,पास आके इन्हें अब तो आराम दे।
प्यार में चलके मैं थक गया हूं प्रिये… जुल्फ की छांव में मुझको विश्राम दे।
है बहकती पवन गंध तेरी लिए, वह तुझे भूल जाए ये मुमकिन नहीं।
मंदिरों में सुबह जब बजे घंटियां ,नाम तेरा ना लूं ऐसा मुमकिन नहीं।
एक दूजे को हम;देवता मान लें, जिंदगी के लिए एक नया धाम दे।
प्यार में चल के मैं थक गया हूं प्रिये …जुल्फ की छांव में मुझको विश्राम दे।
जब फुहारों की चाहत में बैठे रहे ,अब घटाएं चढ़ी तो कहां चल दिए।
कुछ पुरानी किताबों में ख़त जो मिले,खोलकर चूम करके कहां रख लिए।
वृंदावन मौन है राधिका मौन है , बासुरी की मधुर गान घनश्याम दे।
प्यार में चलके मैं थक गया हूं प्रिये…..

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