प्यार-नवनीत

प्यार-नवनीत

किस्से सुनाता हूं मैं तुमको अपने प्यार के,
तलबगार रहते थे हम उनके एक दीदार के,
तुमसे मिला था पहली बार जब मैं कॉलेज में,
लगता था जैसे आ गए है दिन बहार के,
अपनी सहेलियों के साथ जब तुम निकलती थी,
पलके बिछाके के रखते थे रस्ते पे यार के,
आसान नहीं है मुझसे शायरी में जीतना,
हर एक शब्द लिखता मुहब्बत में हार के ।

नवनीत
   लोहरा गाली,बेर्लीली

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