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रिश्ते बंधन के-देवेंद्र अवस्थी

एक हम थे जिसको थी,
साथ में जीने की पड़ी हुयी..
एक वो थे जिसको थी,
अपनी खुशियो की पड़ी रही…
एक हम थे जो हस रहे थे,
उनके जुल्मो को सह सह कर…
एक वो थे जो परेशां न थे,
मुझ पर सितम कर कर…
एक मै था जो कभी भी,
उसके हिस्से में नहीं हुआ,
एक वो थी जिसको मैने,
सबके हिस्से का प्यार दिया..
पर यारों अखिर कब तक,
चेहरा उदास और गम रखता,
कहने लगे थे लोग के अब,
मै हंसते हुये हूँ कम दिखता…
बन्दिशो में जीने से बेहतर था,
माथा चूम अलविदा कह दूँ,
बांध के रखने से बेहतर था,
रिश्ता तोड़ उसे आजादी दे दूँ…..!!

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