रिश्तों में गरमाहट-अवधराम यादव

रिश्तों में गरमाहट-अवधराम यादव

जमाने में मां बाप की आंखों में नमी होती नहीं।
गर घरों में सच्चे सपूतों की कमी होती नहीं।

रिश्ते पनपते हैं गुड्डे गुडियों के खेलों से।
रिश्ते पनपते हैं स्नेह लता की बेलों से।

रिश्ते पनपते हैं अपनेपन के आभासों से।
रिश्ते पनपते हैं पतझड़ में प्यासी प्यासों से।

बड़ा अभागा बालक वह जिसने न देखे पैरों के छाले।
बड़ा सभागा बेटा वह जिसने रिश्तों को कुछ पल दे डाले।

आओ,सुनो सुनाता हूँ रिश्तों की एक भाव विभोर कहानी।
अब तक छलक रहरहा है जिसमें उन बूढ़ी आंखों का पानी।

इक माता का इक छोटा मोटा नन्हा अदना सा बच्चा था।
वह माता ही उसकी दुनिया थी,इतना मन का सच्चा था।

समय बीत गया धनवान बना पर माता भी बीमार पड़ी।
विदेश से भागा भागा आया जब माता जी लाचार पड़ी।

पता चला माता ने एक माह से दाना भी नहीं पचाया।
इतना सुनकर क्रोधित बेटा बुढ़िया कहकर झल्लाया।

बोला रे बुढ़िया मैने तुझको दी हर प्रकार की सुविधा है।
फिर तुझको सुखमय जीवन जीने में कैसी दुविधा है।

सिरहाने बैठी मौसी बोली जब अंगुल भर तेरी छाती थी।
तब ये बुढ़िया ही तुझको निज हाथों से भोजन करवाती थी।

सुविधा से पेट भरेगा न यह वात्सल्य भाव की भूखी है।
स्नेह निवाला डाल जरा सम्मुख जो भी रूखी सूखी है।

पग पग पर पद-चाप सुने ऐसी आहट पैदा कर।
रे लंदन वाले बाबू रिश्तों में गरमाहट पैदा कर।।

 

      Awadhram Yadavअवधराम यादव

  बाराबंकी, उत्तर प्रदेश

 

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