सबका प्यार गवां बैठे – नवीन कुमार

सबका प्यार गवां बैठे – नवीन कुमार

बर्बाद हो गये थे उसी दिन ही
जब घर छोड़कर आये थे कमाने
कमाया भी तो क्या ख़ाक कमाया
सबका प्यार गवां बैठे

बात हो जाती है मोबाईल से मगर
वो बात नही जो थी माँ के गले लगने में
रूठता तो खिलाती थी निवाला
वो निवाला गवां बैठे

डांट पिता से जो पहले लगती थी, अब कहाँ?
गलती करता रहता हूँ यार शबासी देते है
उलझन में जब भी पड़ता वो सुलझाया करते थे
वो सुलझ गवां बैठे

गाछी में आम कटहल लीची फलते थे
उसे तोड़कर दोनों भाई बड़े मजे से चखते थे
यहाँ भी मिलते है बासी सड़े गले हर दूकानों में
खाते है इसे भी आदत है मगर,
वो चखन गवां बैठे

बर्बाद हो गये थे उसी दिन ही
जब घर छोड़कर आये थे कमाने
कमाया भी तो क्या ख़ाक कमाया
सबका प्यार गवां बैठे

Naveen Kumarनवीन कुमार,
मुंबई

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