समर्पण-शोभित अवस्थी

समर्पण-शोभित अवस्थी

  • कर समर्पण देश के हित, देश के हित देश के प्रति ;
    कर समर्पित प्रेम अपना, प्रेम अपना देश के प्रति ।
    तू लुटा दे ज़िन्दगानी ,ज़िन्दगानी स्वप्न अपने ;
    कर न्योछावर कर समर्पित, बचपना ये प्रश्न अपने ।।

कर समर्पित आज यह,भीषण प्रतिज्ञा देश के प्रति ;
मैं करूँगा देश विकसित,देश के सम्मान के हित ।
देश को कर स्वच्छ अपने,मैं लगा दूँगा लगन सब ;
मैं रहूँगा प्रेम से, हाँ प्रेम से सद्भाव से सब ।।

कौन है क्या कर रहा, इस से हटाओ ध्यान अब;
लक्ष्य को कर केन्द्र अपना, अब करो प्रस्थान सब।
कर्म कर अपने बढ़ाओ, देश के सम्मान को;
कम न होने देना बिल्कुल,माता के अभिमान को।

शोभित अवस्थी 

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