समर्पण-शोभित अवस्थी

समर्पण-शोभित अवस्थी

  • कर समर्पण देश के हित, देश के हित देश के प्रति ;
    कर समर्पित प्रेम अपना, प्रेम अपना देश के प्रति ।
    तू लुटा दे ज़िन्दगानी ,ज़िन्दगानी स्वप्न अपने ;
    कर न्योछावर कर समर्पित, बचपना ये प्रश्न अपने ।।

कर समर्पित आज यह,भीषण प्रतिज्ञा देश के प्रति ;
मैं करूँगा देश विकसित,देश के सम्मान के हित ।
देश को कर स्वच्छ अपने,मैं लगा दूँगा लगन सब ;
मैं रहूँगा प्रेम से, हाँ प्रेम से सद्भाव से सब ।।

कौन है क्या कर रहा, इस से हटाओ ध्यान अब;
लक्ष्य को कर केन्द्र अपना, अब करो प्रस्थान सब।
कर्म कर अपने बढ़ाओ, देश के सम्मान को;
कम न होने देना बिल्कुल,माता के अभिमान को।

शोभित अवस्थी 

Ravikant Agarwal

मैं रविकांत अग्रवाल पुणे महाराष्ट्र का निवासी हूँ। मैं वीर रस और श्रृंगार रस का कवी हूँ। मैं साहित्य लाइव में मुख्य संपादक तथा दिशा-लाइव ग्रुप मे प्रेस प्रवक्ता के रूप में काम कर रहा हूँ।

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