सफर-निखिल राज

सफर-निखिल राज

बेचैनी समेटे दिल में, ख़्वाहिशों के बारिशों में |
अरमानों के बादलों में, सपनों के सागरों में |
अपनी मंजिल को देखकर मैं,
आशियाने से निकल पड़ा हूं |
हां,सफर पर चल पड़ा हूं , मैं,सफ़र पर चल पड़ा हूं |

आगाज है ये सफर का,
इंतजार है अंजाम का |
कुछ सफर तो तय हुआ है,
कुछ मुश्किलों का भय हुआ है |
खैर,अपनी मंजिल को देखकर मैं,
फिर से आगे बढ़ रहा हूं |
हां,सफर पर चल पड़ा हूं , मै,सफ़र पर चल पड़ा हूं |

दूरी ये बादलों की,
गहराई देखकर सागरों की |
घबराहट की जंजीरों से,
अपनी ही मंजिलों से |
खुद से खुद का पता पूछ कर मैं,
फिर से आगे बढ़ रहा हूं |
हां,सफर पर चल पड़ा हूं , मैं,सफ़र पर चल पड़ा हूं |

भीग गया हूं बारिशों में,
बस गया हूं बादलों में,
सपनों के सागरों में |
अरमानों के मजार में,
आंख मूंद हो रहा था,
सपनों के बाजार में |
अपनी मंजिल को देखकर मैं,
अब सच में आगे आऊंगा |
हां,सफर पर जाऊंगा , मैं,सफर पर जाऊंगा |

 

   निखिल राज
  प्रेरक, बिहार

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  • Hey friends this is my first Hindi poem on this website I hope you all like it.

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