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सरहद पर साजन को पत्र

प्रियतम! प्राणप्यारे मेरे!
पत्र तुम्हारा पाया मैंने;
करूण स्वप्न में डूबते,
नैनों को समझाया मैंने।

भान तुम्हारी मनःदशा का,
हुआ मुझे, ऐ हृदय सखा!
ना कहो भले मैं भांप गई,
दीपक तले जो छुपाए रखा।

माँ की,बहना की,लाडो की,
बाबा की चिंता करते हो;
दुर्बल-दृग-दृश्य छुपाने को,
पलट कर चल पड़ते हो।

मुरझाए लगे तुम्हें नैंन मेरे,
ना झांक पाए थे तुम इनमें;
पर सच ये है जो देखते तुम,
ना रहती यूं शंका मन में।

जो तब में कहना चाहती थी,
वो आज तुम्हें लिख देती हूं;
जब तुम ना होते हो घर में,
मैं दो किरदार निभाती हूं।

तान अस्त्र, तन कर ज्यों तुम,
रहते पर्वत बन सरहद पर;
मैं दीवारें बन, दसों दिशाओं
में छा जाती हूं घर पर।

राखी पर बहना के समक्ष,
मैं दोनों हाथ बढाती हूं;
पग-पग पर साथ निभाने का,
उनको मैं वचन दिलाती हूं।

सुबह-शाम माँ-बाबा को,
मंदिर डेरे करवा लाती;
“जुग-जुग जियो” के शब्दामृत,
ईश्वर से तुम्हें भिजवा आती।

अब शब्द जो सीखे लाडो ने,
“बाबा-बाबा” करती रहती;
मैं फौजी टोपी पहन उसे,
रण-वीर पिता का पता देती।

मुझमे बसी मैं को, मैं ऐसे
ही तुम बनकर पलने देती;
विचित्र मिलन की यह दशा,
कमी ना तुम्हारी खलने देती।

निःस्वार्थ औरों पर लुट जाना,
ऐ प्यार! तुम्ही से सीखा है;
दुःख के वारों को रोकने का,
व्यवहार तुम्ही से सीखा है।

निष्फिक्र रहो, ऐ प्रेम मेरे!
रहो देशप्रेम में यूं ही मगन;
मैं भी ख़ुश हूं, घर पर सब खुश,
तुम डटे रहो, ख़ुश रहे वतन।

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Riddhika-Acharya

Riddhika-Acharya

Writing singing study... Happy life🤘

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