सर्दी या परिस्थति-कविता यादव

सर्दी या परिस्थति-कविता यादव

हमारा जीवन हमें प्रतेक परिस्थिती में ढलना शिखा देता है ,पर उनके बारे में सोचिये जो परिस्थिती में ढलना चाहे तो भी वो उसमे ढलने में सक्षम नहीं हो पाते उनकी परिस्थीती उन्हें उसमे ढलने नहीं देती ,
में उन् गरीब बच्चो के बारे में बात कर रही हूँ जो अक्सर मंदिर चौराहे पर हमें हाथ फैलाये दिख जाते जाते है ,
लोग जब अपनी कारो में पूरी तरह से स्वेटर ,पफलर ,दास्तानों से ढके रहते है तब ये अपने कपकपाते हाथो से हमसे कुछ पैसे मांगते है कितना अजीब लगता है , है ना
मेरी ये कविता उन्ही पर आधारित है ,

सर्दी आई सर्दी आई
ठंडी- ठंडी सर्दी आई
टोपी मफलर शाल निकालो
लोग सभी जल्दी घर में भागो
कड़कड़ाती कपकपाती
सर्दी आई सर्दी आई
किसी- किसी को भाती सर्दी
किसी – किसी को नहीं लुभाती
स्वेटर मफ़लर टोपी दास्ताने ,
है सभी कुछ ,
उनको ही अक्सर ये
सर्दी भाई सर्दी भाई
जिनके पास स्वेटर तो छोड़ो
रहने को ही घर नहीं है ,
आप ही बताओ भईया कहाँ से उसको
ये सर्दी भाई सर्दी भाई

हमें उन बच्चो के लिए कुछ तो करना चाहिए ताकि वो भी कड़कड़ाती ठण्ड में बच सके उन लोगो जो इनके लिए कुछ भी करने मे सक्षम है उन सभी को इनकी मदत के लिए आगे आना होग़ा….
छमा चाहूंगी अगर कोई भी बाते आप को बुरी लगी हो तो कृपा आप अपनी प्रतिक्रिया देना ना भूले ..

कविता यादव
भोपाल म.प्र.

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