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शाखों पर बैठकर गुजारी हमने रातें-संसर्पाल सिंह

उन शाखों पर बैठकर गुजारी हमने रातें
डर था जिनके कट जाने का

लोगों ने कहा ये तो पागल है
भरोसा नहीं इनके बच पाने का

तांकते रहे उन रास्तों को हम
डर था जिससे दुश्मन क़े आने का

सुरक्षित है आज हमी से वो लोग
जिनको डर था अपने घरों के लुट जाने का

कभी-कभी आंधियाँ भी अपना रुख बदल लेती है
अगर कर लो इरादा उनसे भिड़ जाने का

कभी मत उड़ाओ मजाक किसी का
एक दिन इंतजार करोगे तुम ही
उनकी पीठ थप थपाने का

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