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शरद पूर्णिमा का गीत- गोपी गीत-रेनू सिंह

(१)जबसे ब्रज धाम में आपने जनम लिया
नित ही रमती रमा श्रीनिवास बन गया।
हम शरण में हैं प्रभु त्याग तो न कीजिये
ढूंढ़ती भटक रहीं हाथ थाम लीजिये।।
(२)आपके कमलनयन वेधते हृदय सदा
अस्त्र शस्त्र के बिना ये भी तो वध हुआ।
हम अमोल दासियां नंदलाल आपकी
जीवन आधार भी है एक कृष्ण नाम ही।।
(३)विष व्याल वर्ष वायु आए वृज विनाश को
कौटिक असुर भी तो छू न पाए आपको।
आपदा में ब्रज जन श्याम जब पुकारते
आप प्राणनाथ बन कष्ट से उबारते।।
(४)आप मां यशुमति के सुत केवल हैं नहीं
जीवमात्र में बसे जगव्यापी आप ही।
बिरज को पखारने पाप नाश के लिये
यदुकुल के चंद बन नंद घर जनम लिये।।
(५)पावन पंकज चरण भक्त को अभय करें
दुःख ताप भय हरै सब मंगलमय करें।
करतें पूर्ण जग की कामना समस्त जो
धर दो शीश पर हमारे वरदायी हस्त वो।।
(६) व्रज जन के वीर हैं शोक व्याधि काटते
निजजन के मानमद क्षण‌ में हैं नाशते।
प्राणप्रिय परम सखा त्याग कर ना जाइये
नाथ अब ना रुठिये मुख-कमल दिखाइये।।
(७) श्री के पूजित चरण नित गोचरण करें
प्राणि मात्र के सकल पाप का हरण करें।
ग्वाल बाल के लिये फण पे नृत्य भी किते
रख दो निज पद कमल जल रहा हृदय प्रिये
(८) सुमधुर सुधा समान शीतल सुखदायिनी
ज्ञानी भी बलि जाएं सरस बोल मोहिनी।
माधुरी वचन सुनीं हम भी बेसुध हुईं
फिर हमें पिलाइये प्रिय अधरसुधा वही।।
(९)पावन पीयूष है आपकी परम कथा
जीव पाप काटती नाशती सभी व्यथा।
लीला श्रवण नित ही सबका मंगल करे
दानी जग में वही भक्ति दान जो करें।।
(१०)एक क्षण था हम कभी ध्यानमग्न आपमें
प्रेम के अनंत पल थे बिताये साथ में।
वृंदवन विहारते हम किये अठखेलियां
नैन हो रहें सजल याद कर ठिठोलिया।।
(११) पंकज पद गोचरण वन में जब भी करें
कण कोई ना चुभे सोचती सखी डरें।
व्याकुल मन हमारे कहीं धीर ना धरे
बाट जोहती तके जापती कृष्णा हरे।।
(१२) गोधुलि में जब चलें वन से निज गेह को
रज सनी लटें घनी नित जगाते नेह को।
मोहिनी मुखावली मन को मोहित करें
प्रिय दरश को सदैव प्रति क्षण प्रेरित करें।।
(१३)आपके चरणकमल दुख सकल निवारते
भू के हैं रत्न सम भक्त को उबारते।
रख दो उर पे चरण कुंज क्यो विचर रहे
हमारे उर प्रिय के वियोग में जल रहे।।
(१४)सुखदायी बांसुरी शोक नाशती सभी
रसमयी प्रेम अधर चुमती जो हर घड़ी।
सुनके तान माधुरी जग का भान ना रहे
रस अधर पिलाइये नाथ प्राण जा रहे।।
(१५)ग्वाल गौवे लिये जाते जब वन को हैं
आपके दरश बिना युग समान क्षण वो है।
लौटें जब देखती स्याम मुख लटें घिरी
दुखदायी सी लगें पलकें जब भी गिरी।।
(१६)शरद सरस चांदनी बांसुरी की धुन सुनीं
दौड़ती सभी सखी श्याम नाम लें चलीं।
मोहपाश तज दिया कुटुंब बिसरा दिये
हम अधर में प्रियतम छोड़कर कहां गये।।
(१७) ब्रज वन में हम किये प्रेम लीलाएं कभी
याद कर वो प्रिय क्षण रो रहा हृदय अभी।
देखकर उर विशाल श्री का जो वास है
प्रभु सानिध्य के लिए नित बढ़ती आस है।।
(१८) ब्रज की लीला परम सुखदाई है सदा
जगमंगलकारिणी हर लेती आपदा।
प्राणाधार हैं प्रभु प्राण ही न लीजिऐ
तप्त अग्नि सा हृदय औषधि तो दीजिये।।
(१९)कोमल अति पद कमल वक्ष पे डरी धरे
है सघन निकुंज वन क्यू एकांत में फिरें।
हो रहा हृदय विकल प्रिय दरश दिखाइये
हम अचेत हो रहीं कृष्ण अब तो आइये।।

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