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शातिर जिंदगी-अजय-प्रताप सिंह

शातिर बहुत है जिंदगी खेले नित नया खेल |
इंसान की बिसात क्या ,क्या पास तो क्या फेल ॥
अपना जिसे समझ कर गले से लगा रहे हैं
सम्मोहित हो उसी के कब्जे में आ रहे हैं.
चालक है वश करेंगे ऐसे हैं हम सवार,
डाली है उसी ने तो बिन डोर की नकेल ॥

हर श्वास छिन रही है हर पग तले दुधारी
हर पल यह दगा देती, पर जिंदगी हमारी
कहता है काट देगा हंसकर इसे यूं ही,
सच में यही है जिंदगी गम और खुशी का मेल ॥
एक पल खुशी की खातिर मंजूर गम का मेला
लगाई भीड़ रिश्तो की , भीड़ में भी अकेला
है इतना सघन समंदर जिस ओर देखता है
अदृश्य कभी तो कभी ,मुंह बाए खड़ी ह्वेल ॥
इच्छाओं की अक्षय पोटली ढोता ही जा रहा है
मुसाफिर है, जानकर भी ,साहस दिखा रहा है
पूरा ना कर सकेगा ना इत्तेफाक होगा ,
मंजिल की ओर फिर भी किश्ती रहा धकेल ॥
शातिर है बहुत जिंदगी खेले नित नया खेल ॥

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ajai-pratap-singh

ajai-pratap-singh

My name is Ajai pratap Singh. M . A . B.Ed. 1996 ( c c s uni . Meerut ) Unemployed . I am a simple farmer.I lives in charora .I am p.t.a in siksha sadan inter College jatpura.

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