शायद- विकास विद्यार्थी

शायद- विकास विद्यार्थी

वो माता पिता जो झाड़ू लगाते हैं
सड़कों पर,
धूल जमी होती है चेहरे पर जिनके
निराशा की,
झुर्रियों से युक्त मुखड़े,
जो कभी चमकती होगी,अनायास
जिसपर किसी को प्यार आता था ।

वो चलनशील पैर जो लगातार कार्यालय का चक्कर लगाकर थक चुके हैं,
फिर भी चलकर चौखट को लांघती,
चौका बर्तन करने को ।
सर्द से ठिठुरती हुई बदन हो,
या थकान से परेशान,
फिर भी रहती है तैयार
अपने भविष्य(बच्चों) की तैयारी में ।

इन्ही लोगों में से एक हैं,
हमारे माता-पिता,
जिनका मैं भविष्य हूँ
जो संवार रहे हैं आज भी,हमें
एहसास नहीं है कि’उनका मैं ऋणी हूँ,
जिन्होंने
मेरे खातिर, अपने झाड़ू पोछा,आंसू
और शौक तक दफनाए हैं ।

हम उनकी मेहनत को पलभर में
खर्च करके खुश होते हैं,और
वो हमें खुश देखकर…
पर क्या हमें उनके शीकन का
एहसास तक भी है…?
शायद…!!!

  विकास विद्यार्थी
                   औरंगाबाद,बिहार

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comments
  • Heart touching poetry bikas jii
    Hume at least apne kudrat ko thanks 🙏 karna chahiye har din for greatest mom and dad

    1+

  • ज्ञानचन्द

    July 14, 2018 at 12:13 pm

    बहुत ही खूबसूरत कविता हैं।
    लेकिन खास बात ये है कि हर इंसान अपने माता पिता के ऋणी जन्मकाल से ही होता हैं,
    और इनको चुकाना इस जहां में संभव ही नहीं हैं।
    एहसान रूपी ऋण का बोझ कोई नही चुका सकता।👍👍👍👍

    1+

  • wAhH…
    Yahi h jindagi ki raz…

    bAs ,

    Yahi aapse “aShA” aur vishwash h…!!

    1+

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