आज मेरा मन न जाने क्यो – आराधना सिंह

आज मेरा मन न जाने क्यो – आराधना सिंह

आज मेरा मन न जाने क्यो तुमसे कुछ बात करने को चाहा,
दिल में जो ख्वाहिश थी वो बताने को दिल चाहा,
तुमने मुझे अपने पास न आने का वास्ता दे रखा था,
मगर मेरी ये तन्हाई तेरी ही बाहों का सहारा चाहा

मौन की भी अपनी भी भाषा होती है
समझे कोई इन खामोशियों को इन मे यह अभिलाशा होती है
जैसे सावन में न जाने कब बारिश गीर आते है
वैसे मन के भाव न जाने कैसे आँखो में आँसू बन कर निकल जाते हैं।

जमाना क्या कहेगा हमें की हम किस राह पर चल रहें हैं
यह रहें कर हमने देखा इंसान ही इंसान से जल रहें हैं
सरगोशी करते फिरते हैं ये हमेशा अपनो की ही
और दुसरो के लिए ये रहनुमा बने फिर रहें हैं।

सबसे ज्यादा दुःख उम्मीद ही देती
क्योंकि उम्मीद हम हमेशा दुसरो से ही रखते हैं
और जरूरी नही की हर सख्श उम्मीद पर खरा ही उतरे

Aradhna singhआराधना सिंह
सूरत, गुजरात

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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