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दर्द शायरी 2-ओंकार-चौहान

(12) रास्तो मे मंजिलो की ख्वाहिश कौन रखता है ।
यू मोहब्बत मे जीने की ख्वाहिश कौन रखता है ।
मोहब्बत का रास्ता शीरीफ एक होता है ।
उस मोहब्बत के साथ मारने का मजा ही कुछ और होता है

(13) उस चमकती चाँदनी मे तेरा चेहरा ऩजर आता है ।
हसीनो की बस्ती मे तेरे जुल्फों का पहरा ऩजर आता है ।
ख्वाहिश तो बहुत थी तुझे पाने की ।
मगर तेरा दिल ही कातिल हसीना निकला ।

(14) तुम मानो या ना मानो , मगर मोहब्बत थी , तुमसे इतना ।
तेरे ख्वाहिशो को पूरा करने की ना हिमत थी मुझमे इतना ।
तूने तो अपना हमसफर साथी चुन लिया दूसरा ।
मगर मुझमे तुझे भूलने की हिमत नही है इतना ।

(15) काली रात है , साया भी मेरा काला है ।
और उस खुदा से मै क्या मांगू ।
कियो की आखरी वक़्त मौत है ।
मौत ही मेरा आखरी साया है ।

(16) ना हसीनो की बस्ती मे जाओ , ओ बड़ी कातिल होती है ।
पहले तो ओ पास बुलाती है , फिर दिलो से खेलती है ।
जब दिल भर जाए तो ओ , दिलो को तोड़ती है ।
फिर जाकर किसी दूसरो के दिलो से खेलती है ।

(17) आँधियों का पीछा करना छोड़ दिया है हमने ।
यू मोहब्बत मे भरोसा करना छोड़ दिया है हमने ।
उस मोहब्बत पर क्या भरोसा करे
जो उन कातिल आँखो की तरफ देखना छोड़ दिया है हमने ।

(18) शहनाईयो की धुन कही दूर सुनाई देती है ।
उसकी चूड़ियों की खनखनाहट कही दूर सुनाई देती है ।
उसके चूड़ियों के दीवाने थे हम बड़े ।
आज वह चूडिया किसी और के लिए खनकते है सारे ।

(19) आँधियों का पीछा करना छोड़ दिया है हमने ।
यू मोहब्बत मे जीने की ख्वाहिश छोड़ दिया है हमने ।
आखरी सफर मे क्या मागे उस खुदा से ।
बस उस बेवफ़ा से मुलाकात हो जाए कुछ ऐसे ।

(20) लहरों के किनारे पर बैठ कर उसका इंतजार कर रहा था ।
आँखो मे कई सपने सजा कर उसका इजहार कर रहा था ।
वह आएगी बस यही सोच कर इंतजार कर रहा था ।
आई भी तो क्या लेकर आई , बेवफाई का पैगाम लेकर आई थी ।

(21) वाह ! रे खुदा तेरी खुदाई , तूने ये मोहब्बत ही कियू बनाई ।
बनाई तो ठीक , मगर फिर इसमे कियो लिखी तूने जुदाई ।

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