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रिश्तों की राजनीति-द्रष्टि भदजा

दुनिया उलझी हुई है इन रिश्तों के नाम पर ।कोई खुशी से अपने रिश्तों के साथ वक़्त बिता लेते है । कोई अपना बन कर अपने पे ही वार किया करते हैं । रिश्ता हो या फिर कोई सरकार चुनाव तो हर जगह होता ही है ,कुछ अपने फैसले से तो कुछ लोगो के ।

   बात करे देश की राजनीति की तो उसमें भी उतार चढ़ाव हुवा करते है। कभी ये सरकार चाहिए तो कभी वो , यही सिलसिला सालो से चलता आ रहा है ।कोई उसमे जाख कर नही देखता की उसकी नीव क्या है।जो आने वाली पीढ़ी को काम आ सके । 

   समय के साथ साथ कुछ बदलाव भी जरूरी होता है।चाहे वो देश की राजनीति हो या फिर हमारे रिश्तों की । 

    ऐसा नहीं होता कि जो रिश्ता हम बनाये रखे हैं इतने वक़्त से तो उसमें कोई उतार चढ़ाव न हो। दोनो को ही ये बात समझनी चाहिए कि जिंदगी आज है कल नही। साथ रहेंगे तो भी दिन निकल जाता है और न रहो तो भी वो तो गुजर ही जाता है। तय आपको करना है आपको कैसे रहना है।

    जरूरी नही राजनीति का मतलब हमारे दिमाग में बिठाया गया है वैसा ही हो। उसको हम अलग नजरिये से भी देख सकते हैं । रिश्तों में आगे बढ़ने के लिए कुछ ऐसा भी करना जरूरी होता है की वो रिश्ता जैसा है वेसा ही रहे । राजनीतिक खेल हम अपने रिश्तों को युही बरकरार रखने के लिए खेल सकते हैं ।
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