शायरी-धीरेंद्र पांचाल

शायरी-धीरेंद्र पांचाल

बिन पतझड़ गिरने लगी हैं पत्तियाँ अब साख से ,
हिचकियों का दोष क्या जब चली कटारी आँख से,
मिलने और बिछड़ने का भी एक सिलसिला जारी था,
तिलक कर लिया हमने भी उन चिट्ठियों की राख से ।

 

   धीरेंद्र पांचाल
  चन्दौली ,उत्तर प्रदेश

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