शायरी- अनुश्री दुबे

शायरी- अनुश्री दुबे

मेरे अपनों से मुझको प्यार की दौलत न मिली।
मेरी ताउम्र निकल गई मगर मुझको शौहरत न मिली।
ऐ दोस्त तेरे साथ सब कुछ छिन गया मगर;
खुदा से मुझको तुझे भूलने की मौहलत न मिली।

2)-हजारों जख्मों ने मुझको भी दर्दे दिल बना दिया।
मगर इन हजारों इम्तिहानों ने मुझे काबिल बना दिया।
मेरी जिस दोस्त से उम्मीद थी साथ देने की;
उसने ही मुझको मेरे सपनों का कातिल बना दिया।

3)-हम कल तन्हा थे आज तन्हा ही रह गए।
अपना दर्द हम हमेशा रो रो कर सह गए।
जब सुनाने को नहीं मिला कोई दिल-ऐ-दास्तां;
तो तारों से दिल की हर बात कह गये।

4)-कोई ले न सपनों से सोने से डरती हूं।
आपको पल भर को भी खोने से डरती हूं।
मेरी इन आँखों में अभी बसी है आपकी तस्वीर;
अरे धुंधला न जाये रंग रोने से डरती हूं।

5)-कोई कुछ कहता है तो काला धुआं मन मैं छा जाता है।
क्यों यहां इंसान ऐसा हो गया है ही इंसान को खा जाता है।
खुदा तुझे मालूम है मरके मेरी समस्याओं का समाधान हो जाता;
तो क्यों आखिरी समय मृत भाई का चेहरा सामने आ जाता है।

6)-अगर मैंने पाप किये तो पापों का घड़ा भरता क्यों नहीं?
कोयले की खान का कोई भी कोयला निखरता क्यों नहीं?
ऐ-ईश्वर अपनी जन्नत रख लो मगर इतना बता दो कि;
जब दिल इतना ही टूट चुका है तो अब बिखरता क्यों नहीं?

7)-तो है मगर मुझको कहीं किनारा नहीं मिलता।
निहारती रही आस्मां मगर अब कोई तारा नहीं मिलता।
अब ये दुनियां इतनी खुदगर्ज हो गई है कि;
इंसान टूटके बिखर जाता है मगर सहारा नहीं मिलता।

8)-ऐ खुदा दोस्त अंगारे बने कुछ इस कदर जल रही हूं मैं।
पैरों में पड़े छालें मैं जानती हूं किस कदर चल रहीं हूं मैं।

9)- सजाया जिस सपने को वो क्यों इतना दूर हो गया है।
अब मेरा ये दिल आखिर क्यों इतना चूर हो गया है।
खुद का ही बजूद मिटाना चाहता है मेरा ये कमबख्त दिल;
मेरे खुदा ये दिल आखिर क्यों इतना मजबूर हो गया है।

10)-अच्छा लगता है जब कोई अपना साथ रहता है।
मगर कितना समय हुआ वो लम्हा साथ रहता है।
मेरी दोस्त ही दुश्मन है खुद को कैसे समझाऊं;
बनके आँखें के आँसूं उसका चहेरा साथ रहता है।

11)-मेरे खुदा आज की रात बरसात हो जाये।
अब मेरी तारों से भी तो बात हो जाये।
अब एक ही दुआ देना मुझको ऐ मेरे यारों;
ये रात मेरी जिंदगी की आखिरी रात हो जाये।

12)-ऐ दुनियां बालों अगर मर गई तो मेरा कफन उठाना मत;
क्योंकि मरे हुऐ लोग कफन उठाने से कभी जिंदा नहीं होते।

13)-मरूं परंतु मेरीे लाश किसी को नसीब न हो।
ऐ खुदा मेरे जितना कोई भी बदनसीब न हो।

14)-गौरों से कोई उम्मीद करता नहीं और अपनों से उम्मीद क्या;
अरे वक्त आने पर अपने ही तो जलाकर चले जाते हैं।

15)-बच्चों पर इतना शक मत करो कि आप उनकी नजरों में गिर जाओ।
क्योंकि नजरों में गिरे हुए लोग फिर से कभी भी उठ नहीं सकतें।

                                                       
                                              
               

Anushree Dubey

   अनुश्री दुबे          

      इटावा

  उत्तर, प्रदेश

 

 

 

Anushree Dubey

मैं अनुश्री दुबे इटावा उत्तरप्रदेश की निवासी हुँ। मैं करुण रस की कवित्री हुँ। मैं कक्षा 12वी की छात्रा हुँ।

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