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यार की मेरे सालगिरह है-देवेंद्र अवस्थी

यार की मेरे सालगिरह है वो आस लगाए बैठी है
पर मेरी कलम हर अल्फ़ाज में जख्म छुपाए बैठी है,

लफ़्ज़ो में मैं इश्क़ की नज़ाक़त कहाँ से लाऊ अब
अब तो वो रक़ीब को बाहो में लिपटाये बैठी है,

कोई तो समझाए उसने ही उम्मीद के दिये बुझाये है
मै तीरगी से घिर गया हूँ वो मोमबत्ती जलाये बैठी है..!!

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