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शीर्षक – महक-ज्ञानन्द चौबे

हर वक्त अजीब सी, महक आती है,
कमबख्त, उलझने , साथ लाती है।।
समझ नहीं पाते , कहाँ से लाती है?
ढूँढता हूंँ , पर ! मिल नहीं पाती है?

चलता रहता हूंँ , राहें रुकी रहती है,
हम आगे बढ़ते , वो खड़ी रहती है।
कहते हैं ,तू भी,हंँस बोल लिया कर,
मेरे संग-संग ,तू भी ,चल लिया कर।।

न जाने क्या सोचकर, चुप रहती है,
अचानक वो, जोर से बोल पड़ती है।
कैसे चलूँ ,मुझे फुर्सत कहाँ रहती है,
कभी तुम, कभी, गाड़ीयाँ दौड़ती है।।

अचानक उसने मुझे झकझोर दिया,
मेरे दिल पर ,दर्द ने, दस्तक दे दिया।
मैं समझ गया , कहीं और से नहीं,
आँसू के बिखरने से महक आती है।।
✍️ ज्ञानंद चौबे
04/10/2020

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