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‍श्रृंगार-संतोष कुमार कोली

सजने संवरने नायिका बैठी, खोल श्रृंगारदान,
है शब्दों का टोटा, नहीं कर सकूं बखान।
सिर का खोल रही जूड़ा, बैठी वह केश सुखाय,
जग में अमिट अंधेरा, धीरे-धीरे कालिमा छाय।
पूर्णिमा की ज्योत्स्ना से, श्वेत पाउडर रही छिड़काय,
चारू चंद्र की चंचल किरनें, खेले आंख मिचोली आय।
फैली मायामय ज्योत्स्ना, संवृत जहान।
है शब्दों का टोटा, नहीं कर सकूं बखान।
नीलांबर की साड़ी पहनी, लग रही अति सुंदर,
झिलमिल करते लाखों मोती, जड़ा है जिनको स्वयं पुरंदर।
नीलिमा पर पीलाई से, एक आभा बने निरंतर,
जिसके ज्योतिर्मय पुंज से, प्रकाशित है यह चराचर।
इस देवी के आंचल में, सृष्टि करे रसपान।
है शब्दों का टोटा, नहीं कर सकूं बखान।
चंद्रदेव का सीसफूल है, आलोकित जिससे संसार,
ध्रुवदेव की बिंदी लगाई,सप्तऋषि नथनी का तार।
चम -चमाचम मोती चमके, आकाशगंगा का बना है हार,
स्वर्गलोक के सकल देवता, रहे देवी की आरती उतार।
जल में रही निहार, दूसरा नहीं उपमान।
है शब्दों का टोटा, नहीं कर सकूं बखान।
शीतल मंद सुगंध पवन, ज्यों इत्र रही छिड़काय,
चारों दिशा संनाटा फैला, तरु खड़े है सीस झुकाय।
छली-सी लग रही यह नायिका, मन ही मन रही शरमाय,
सब देव खड़े कर जोड़, हम बलिहारी देवी पर जाय।
अनंय रचना देखकर, हैरान स्वयं भगवान्।
है शब्दों का टोटा, नहीं कर सकूं बखान।

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