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सैलाब-माला-चौधरी

शब्दों का सैलाब हूं मै
मेरे अल्फाजों को जरा संभल के छेड़ना
💔
अपनों के दिए आंसू हैं
मेरी आंखो से बहते ,
तानों उलाहनों से जख्मी मेरे दिल का कोना कोना
💔
एक दर्द का समन्दर उठता है मेरे अंदर
ना जाने कितनी चींखें मेरे सीले लबों पर
💔
मैं आंसुओं का सागर , तूफान ए बवंडर हूं
मेरे जज्बातों से जरा संभल के खेलना
💔
बरसों से बन्द बड़ी हूं घड़ी की सुइयों के जैसी
खामोशियों में लिपटी हुई सी
एक कमरे में सिमटी हुई हूं
💔
हर किसी ने तोड़ा , हर एक ने बिखेरा , रिश्ता कोई हो चाहे , पर मतलबी हैं सारे
💔
जिसे जितना अपना समझा , जिसे जितना ज्यादा चाहा
उतने ही टुकड़े टुकड़े मेरे दिल को उसने तोड़ा
💔
किसी सूनी सी झील का मै ठहरा हुआ सा पानी हूं
मेरे सन्नाटे में कंकड़ जरा संभल के मारना
💔
शब्दों का सैलाब हूं मै
मेरे अल्फाजों को जरा संभल के छेड़ना
💔

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