सोने का भारत-दीप जांगड़ा

सोने का भारत-दीप जांगड़ा

रक्षक पर पत्थर बरसाना प्रमाण है कायर होने का
कसमों वादों में लूट बैठा वो भारत जो था सोने का

अजब मिला है सबक देश पर प्राण न्यौछावर करने का
दुश्मन से लोहा लेने वाला हुआ शिकार एक धरने का
किसकी है बिसात खेल ये कौन जमाये बैठा है
है कौन फ़िराक में सत्ता की जो घात लगाए बैठा है
दर्द हुआ है कितनों को सिर्फ़ एक ही कुर्सी खोने का
कसमों वादों में लूट बैठा वो भारत जो था सोने का

कोई रख के तराज़ू बैठा है कोई सामने मौत के खड़ा हुआ है
कोई भारत बंद में उलझा है कोई हिसाब मांगने अड़ा हुआ है
है ख़बर किसी को नही देश की सब बस वोटों का खेल है
मैं ये दूंगा मैं मैं वो दूंगा हर एक शब्द में बस झोल है
सब अंधे बहरों में बलकारी आंसू मगरमच्छ के रोने का
कसमों वादों में लूट बैठा वो भारत जो था सोने का

कभी गोली से कभी पत्थर से कभी शिकार भीड़ का होता है
परिवार से जाकर पूछो उसके वो हाड़ रीढ़ का होता है
दुश्मन को मारने निकला था वो जो कल पत्थरों से मारा है
झूठी ज़न्नत के मोह में निकले दहशत गर्दों से हारा है
जहां पाले जाएं दुश्मन घर में है पत्तन देश उस बौने का
कसमों वादों में लूट बैठा वो भारत जो था सोने का

लोकतंत्र हंसी का पात्र हुआ है आंख प्रजा भी मूंद चुकी है
अधर्मी शाशक राज़ छोड़ दे विरोधी जनता ऊब चुकी है
अंधकार मय है कल भारत का ये कल्पना करना ज़ायज़ है
देशहित की बात भूल कर घर अपना भरना जायज है
“दीप” भुझाकर होता है दुःख असल रोशनी खोने का
कसमों वादों में लूट बैठा वो भारत जो था सोने का

 

    दीप जांगड़ा

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