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तात्रिक ‘ भिखारी ‘-अजय-प्रताप सिंह-

मांगने को भीख निकला
ले कटोरा स्वर्ण का ।
भिक्षु का अधिकार छीने
लेबल लगाए कर्ण का ।
रक्त रंजित श्वेत चोला
है अहिंसा का पुजारी । हाय कैसा ये भिखारी ॥
छीनता अधिकार को
देकर दुहाई राम की |
रात दिन माला जपे वो
लक्ष्मी के नाम की ।
बांटता निज प्यार सब में ,
हाथ में लेकर दुधारी । हाय कैसा ये भिखारी ॥
सम्मान , सत्य ,शांति
की हवन की भेंट सब ।
कर प्रज्वलित अनल
धूमिल किए सारे नक्षत् ।
खोजती है जीव को,
वायु में सांसे बेचारी । हाय कैसा ये भिखारी ॥
श्मशान में जलती चिता पर
बैठकर करता हवन ।
कांपती भय से जमीन
चित्कार उठता यह गगन ।
कांप उठे देव भी जब,
भिक्षु की शोभा निहारी । हाय कैसा ये भिखारी ॥

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