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तो क्या मैं अब ख्वाब देखना ही छोड़ दूं -सौरभ लखनवी

माना कि राह मुश्किल है मंजिल की बहुत,

तो क्या मैं अब ख्वाब देखना ही छोड़ दूँ ?

तमाम लोग शिकश्त खाकर बैठ गये है यहाँ,

सिर्फ इस वजह से मैं भी कोशिश करना छोड़ दूं ?

“उसकी” रहमतों से मंजिल के करीब पहुँच गया हूं मैं,

और तुम ये कहते हो कि “उसपे” यकीन करना छोड़ दूँ ।

अरे जाओ ! बड़े आए मुझे नसीहत देने वाले,

भला तुम्हारे लिये क्यूं मैं अरमान रखना छोड़ दूँ ?

  • सौरभ लखनवी

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