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तुझे ढूंढ़ने निकलें या खुद को भूलाने निकलें – नेहा श्रीवास्तव

तुझे ढूंढने निकलें या खुद को भूलाने निकलें,
तुझे भूलने के फिर से कई बहाने निकलें।
अब हसरते नही हैं दिल मे कोई नई,
मंजिल वही पुरानी ,ख्वाब पुराने निकलें।
यूँ मुक्कदर भी परखता रहा जब वक्त की मशाल पर,
मेरी हाथों की लकीरों मे कई फ़साने निकलें।
जब अपनो से अपनेपन का फासला खत्म हुआ,
गैरों की दहलीजों पर दिल को बहलाने निकलें।
जब लोग संजीदा रहने लगें खुद के शहर मे,
हम फिर से एक बार मुस्कुराने निकलें।
उस दर पर कोई खुदा दिखता नही ,
मयकदे पहुँचे तो खाली पैमाने निकलें।
कोई खफा है मुझसे एक जमाने से बहुत ,
आज हर मसले को सुलझाने निकलें।
तेरे दर से लौट आया हूँ कई बार मगर,
जालिम तेरे तो कई ठिकाने निकलें।

Neha srivastavनेहा श्रीवास्तव
उत्तर प्रदेश(बलिया)

6 thoughts on “तुझे ढूंढ़ने निकलें या खुद को भूलाने निकलें – नेहा श्रीवास्तव”

  1. बहुत बढिया, बेहतरीन रचना अब हसरते नही है दिल मे कोई नही , मंजिल वही ख्वाब पुराने निकले वाहहह जबरजस्त बाकी सभी भी लाजवाब आप बहुत अच्छा लिखती है लिखना जारी रखे।

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