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त्योहारों की महिमा-अजय-प्रताप सिंह

त्योहारों को आते जाते एक जमाना बीता ।
गए भूल सब धीरे-धीरे कुछ नहीं हमने सीखा ।
क्या अपनाएं किस को त्यागे यह निर्णय नहीं कर पाए ,
त्यौहार गए गया सब कुछ जीवन का हर रंग फीका ॥
अंतर्द्वंद बढा मन में देख -देख व्यवहार ।
निर्धारण इनसे ही होता कैसा हो त्योहार ।
सृष्टि का प्राचीन नियम है परिवर्तन,
सद्गुण सभी ग्रहण करें कलुषित गुणों का तिरस्कार ॥
बंधन तोड़ जगत के सारे हर कोई अकेला रहना चाहे ।
व्यथा हृदय में रहे समेटे ना सुनना ना कहना चाहे ।
फांसी लगा मुक्त होता है या पीता विष का प्याला,
मनोभाव को जिहव्या से नहीं धन से ही कहना चाहे ॥
बिगड़े संबंध सुधारते थे त्योहारों से ।
जीवन उत्साहित होता था मिलकर नए विचारों से ।
समाधान शंकाओं का दुविधा का निस्तारण,
नई युक्तियां मिलवाती थी समृद्धि के द्वारों से ॥
कितना भी जग बदल जाए पर त्यौहार नयापन लाता है ।
दूरी कितनी बढे ,प्रबल हो, पर अपनापन लाता है ।
गांठे भिन्न विचारों की हो मजबूती पर लेकिन,
संस्कृति का ताना-बाना अपना रंग दिखाता है ॥
आनी जानी दुनिया है नित नए रंग बदलती है ।
ठोकर जितनी खाती है उतनी ही और संभलती है ।
बदलेगी, बदलेगी ,बदलेगी हो कर लहूलुहान,
घायल की हर एक टीस से एक नई सीख निकलती है ॥

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ajai-pratap-singh

ajai-pratap-singh

My name is Ajai pratap Singh. M . A . B.Ed. 1996 ( c c s uni . Meerut ) Unemployed . I am a simple farmer.I lives in charora .I am p.t.a in siksha sadan inter College jatpura.

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