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कविता :उम्मीद अभी बाकी है-प्रभात-पांडे

अभी मुझे जीवन में , कुछ करना काम बाकी है
अपने आलोचकों को , देना जवाब बाकी है
अभी मैं अन्जान हूँ ,ज़माने की नजर में
नाम अपना भी नग़मानिगारों में ,आना बाकी है
ये जो कारवां है बस चल पड़ा है अब
मुद्द्ये जिक्र सारे नजारों में बाकी है
मुझे बदनाम करना है थोड़ा शौक से कर लो
तुम्हारी महफिलों में ,मेरा जिक्र बाकी है
लहरों से आँखें मिलाने की चाहत है मेरी
मेहनत की कस्ती समंदर में ,उतारना बाकी है
न डर है मुश्किलों से ,न भय है हार का
अपने हाथों की लकीरें ,बनाना बाकी है
मेरे हार जाने पर ज़माने की नजर है
मेरी जीत का परचम लहराना बाकी है
दुनिया की लम्बी दौड़ में ,ये तो बस आगाज है मेरा
उड़ने को अभी आसमान बाकी है
लड़े बिना हार जाना ,वो मेरी फितरत में नहीं है
टकरा जाने की जुंबिश ,अभी मुझमें बाकी है
माना चौतरफा ,ना उम्मीदियां ही हावी हैं
जूझने की तड़प अभी भी मुझमें बाकी है
इंसानियत का दुनियां में,लहराना है परछम
कुछ कर दिखाने का , मुझमें अरमान बाकी है
तुम मुझे सराहो ,नहीं मेरी बुलन्दी की आगाज
उम्मीद के दिये को जलाना बाकी है
सत्य को आज पसंद कोई करता नहीं है
सत्य को गगन तक पहुँचाना बाकी है
अँधेरा हो गया है ,जो उजालों को मिटा के
उजाला फिर से लायेंगे ,जिगर अपना जलाना बाकी है
भायी नहीं है मुझे ख़ामोशी ,जब भी सत्य झुका है
इंतजार कर जीतेगा सत्य ,मेरे जिस्म में अभी रूह बांकी है
मेरी ईमानदारी को न परख ,तू हार जायेगा
अभी भी जीवन में ,और भी बिसातें बाकी हैं
साहित्य के पन्नों पर ,नये पन्ने जोड़ना है अभी
क्योंकि ख्वाहिशों का सफर बाकी है।।

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