उम्मीद-अरूण आज़ाद

उम्मीद-अरूण आज़ाद

आँखो मे सपनो का
एकशहर लेकर घूमता हू
मै भी अपने पर्स मे
अपना घर लेकर घूमता हू ।
उम्मीदो से सबकी आँखे तकती रहती है मेरी ओर
मै अकेला नही,
की नज़र लेकर घूमता हू
मै भी अपने पर्स मे
अपना घर लेकर घूमता हू ।
हताश निराश जब मै
थक जाता हू
ठोकर खाकर गिरता हू
रूक जाता हू
किस्मत जब खुद को
चिढ़ाने लगती है
दाये उम्मीदो के
बुझाने लगती है
तब घर मे बैठे
ईश्वर के कदम ले चूमता हू
मै भी अपने पर्स मे
अपना घर लेकर घूमता हू ।

 

 

Arun Azadअरूण आज़ाद
 रिसिया , बहराइच, उ.प्र.

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