वाह रे समाज-पूनम शर्मा

वाह रे समाज-पूनम शर्मा

वाह रे समाज मैं क्या बात करूं तेरी,
सर पर छत देने के बदले,
इज्ज़त ही ले ली मेरी।
वाह रे समाज मैं क्या बात करूं तेरी।।
मासूम चेहरा ना तूने कभी देखा,
वासना ही छाई केवल आँखों में तेरी।
वाह रे समाज मैं क्या बात करूं तेरी।।
शराफत का चोला तो ओढ़ा है बाहर,
पर नियत तो खोटी ही निकली तेरी।
वाह रे समाज मैं क्या बात करूं तेरी।।
दोष केवल पुरुषों को देती है दुनिया,
यहां औरत ही दुश्मन बनी मेरी ।
वाह रे समाज मैं क्या बात करूं तेरी।।
मेरे आँसू की कीमत किसी ने समझी,
मेरी आबरू को बेच-बेच जेब भरी तेरी।
वाह रे समाज मैं क्या बात करूं तेरी।।
कहीं भी महफूज़ नहीं घर हो या बाहर,
लड़की होना ही क्या गलती होती है मेरी?
वाह रे समाज मैं क्या बात करूं तेरी।।

 

 पूनम शर्मा

चंद्रावल, दिल्ली

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