“””वक़्त बदला या बदले हम”””जितेंद्र कुमार शर्मा

“””वक़्त बदला या बदले हम”””जितेंद्र कुमार शर्मा

वक़्त बदला या बदल गए हम, एक पल में खुसिया दो पल के गम।।
पता नही कहा आ गए हम।।।
“”वक़्त बदला या बदले हम………..
कंधो पर है अब जिमेदारियों का बोझ ,
हर किसी का टूटता है सपना यहां, हर रोज..
“”वक़्त बदला या बदले हम””..…..
सपनो की दुनिया को सजोने का अब किसी के पास वक़्त नही …अब अपने है कहि ओर हम है कहि….
अपनो को दे खुसिया ओर खरीद के गम ..आज के समय मे नही किसी मे ऐसा दम..
“”वक़्त बदला या बदले हम””..…..
कुछ यहा अपनी लाचारी का गुण गान गा रहे है….
अगर हो काबिल तो यहां कुछ न कुछ पा रहे ह हम…
“”वक़्त बदला या बदले हम””..…..
जरूरतों के सील सिले इतने है बढ़ गए,,, होकर कामयाब कामयाबी के अंतिम छोर तक पहुंच गए हम..
न कुछ पाने की ह खुसिया बस अपनो के खोने का ह गम.…..
“”वक़्त बदला या बदले हम””..…..
ये कैसे होगा वो कैसे होगा दिन ढल जाता है यही सोच सोच…आजकल हर कोई रखता ह ऊपर उठाने से ज्यादा हर किसी को नीचे गिराने की सोच…अपने से छोटेे (गरीब)को खा जाते है वो नोच नोच ..
भूल जाते है वो की किसी से छोटे होंगे हम…
“”वक़्त बदला या बदले हम””..….
होकर सफल यहां अपने गम के समय को भूल जाता है।….
सुखी रोटियां खाने वाला आज काजू बीदाम व पोऐ खा रहा है।…
परिवार में रहने वाला आज दोलत से गम भूला रहा है।….
अपने सोच रहे है कि सब साथ रहेंगे हम.…..
“”वक़्त बदला या बदले हम””..…..
चिंता में हमने जीवन बिता डाला है ऐसे समय मे कैसे किसी ने घर को संभाला है।.……
अगर मिलकर रहे साथ हम,
तो क्या खुसिया ओर क्या गम,
हर समय में रहेंगेे अपनो के पास हम..
“”वक़्त बदला या बदले हम””..…..

Jitendra Kumar Sharmaजितेंद्र कुमार शर्मा
(बीकानेर) राजस्थान

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