वर्षा आनंद-दिव्यानि पाठक

वर्षा आनंद-दिव्यानि पाठक

भीनी-भीनी प्रातःकालीन फुहवार से।
र्दूवा पर बीछी मोतीयो की कतार से।
नवीनता को औढे हरी बौछार से।
हर्षित हूँ पृकृति के इस श्रेष्ठ उपहार से।
आनंदित हूँ खेतों के बींधती बूँदो के वार से।
झुमते हैं वृक्ष इन बूँदो के पृहार से।
मजबूर करती टहनीया निकलने को मुझे द्वार से।
सौरभ भी रिझा रहा हैं किसी विचार से

 

 

Divyani Pathakदिव्यानि पाठक

सेहोर, माधियप्रदेश

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