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यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था-देवेंद्र अवस्थी

यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था
पर होता कभी उदास नहीं था
रूबरू तो मैं हर किसी से होता
पर कोई दिल के इतना पास नहीं था,
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था…..

फिर एक समय येसा आया
एक शख़्स ने प्रेम का दीप जलाया
जाने कब हो गयी मोहब्ब्त उससे
उसने मुझपर इतना प्यार लुटाया
संग आना संग जाना होता था
उसके संग समय बिताना होता था
अतिरिक्त कोई दिल मे एहसास नहीं था,
यूँ तो मै कुछ खास नहीं था…….

हर लम्हा जो उसके सग बीते
वो यादगार बन जाया करता
जब पास मेरे वो ना होती तब
उसकी यादों मे खो जाया करता
उसकी याद मे खोने पर भी
मुझको तन्हायी का आभास नहीं था
यूँ तो मै कुछ खास नही था……

इन प्यार भरे एहसासो के संग
एक दूजे का साथ निभाते थे
अगर कभी वो मुझे बुलाती
सब काम छोड़ पहुंच जाते थे
दिल में प्रेम बहुत था लेकिन
अभी तलक हुआ इजहार नहीं था,
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था…..

फ़िर समय ने येसी करवट बदली
मुश्किलों ने उसको घेर लिया था
हादसों में ऐसे उलझ गयी वो
कि आफ़िस आना भी छूट गया
चाहता था मै वो फ़िर से आ जाये
पर वापस लाना आसान नहीं था,
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था…..

समय की इस बेरुखी ने मेरा
बहुत बड़ा नुकसान किया था
जाने कहाँ खो गयी थी वो
साथ मेरा अब छूट गया था
उसकी यादों से बाहर आना
मुझको इसका अभ्यास नहीं था,
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था….

आखिर कर मेरी जिन्दगी ने
फ़िर से एक नया था मोड़ लिया
किस्मत ने उसके आफ़िस ले जाकर
दोबारा से था हमें मिला दिया
उनका मुझसे दूर चले जाना
शायद कुदरत को मंजूर नही था,
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था….

चाहे दिन में हो चाहे रातो में
मैं खोया रहता उसकी यादों में
जिस दिन उससे मिलना होता
मैं खो जाता था जज्बातों में
खुद को खुशनसीब मानता था
जब साथ में उसके होता था
उसके शिवा कोई और अब
दिल के इतना पास नही था…
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था….

विधि ने एक बार फ़िर से
एक नया था खेल रचाया
मैं सन्नाटे में बैठा हुआ था
अचानक से उसका फ़ोन आया
अट्ठारह को शादी होनी थी
आमंत्रण का समाचार सुनाया
मुझे जो दिलाशा अब दे पाता
येसा कोई भी पास नहीं था,
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था….

जैसे तैसे करके मैने खुद को
मुर्छा खाने से बचा लिया था
प्रेम के मधुगुंजित स्वरों में
उसको मुबारकबाद दिया था
दिल में जो भी हसरते थी मेरे
उन सबको अब जला दिया था
यार इस लम्हे को जी पाना
जिसका मुझे एहसास नहीं था,
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था….

आखिर वो दिन जल्दी आया
शौहर उसका बारात था लाया
मैने प्रेम पत्र देने खातिर जो
लिफ़ाफ़ा खरीद कर रखा था
उसी लिफ़ाफ़े को ले जाकर
मैं कन्यादान था कर आया
अन्दर तो मेरे आग लगी थी
बाहर से तनिक भी उदास नहीं था…
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था…..

किस्मत ने मुझको ऐसा लूटा
घर भी खोया घाट भी छूटा
दिल ने जो सपने देख रखे थे
उन सपनो ने ही मुझको लूटा
आँखो तले अँधेरा छाया था
उसकी खुशी देखने खातिर
जब अपनी मैय्यत में आया था
अब सिर्फ़ एक दोस्त बचा था मैं
पहुंचा भी उसके पास नहीं था,
यूँ तो मैं कुछ खास नहीं था……

#देव…

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