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मुख से निकले शब्द वापस नहीं होते

मैंने सुना है, इंग्लैण्ड के एक मेडिकल कालेज में एक विद्यार्थी की मुखाग्र परीक्षा हो रही है। और सब विषयों में उत्तीर्ण हो गया, अब यह मुखाग्र परीक्षा आखिरी परीक्षा है। इसमें उत्तीर्ण हो जाये तो उसे इंग्लैण्ड की चिकित्सा की सबसे बड़ी उपाधि मिल जाये। तीन डाक्टर उसकी परीक्षा ले रहे हैं। उन्होंने उससे कहा कि इस—इस तरह का मरीज है, इस—इस तरह की बीमारी है, ये—ये दवा देनी है, कितनी मात्रा में दोगे? उसने जल्दी से मात्रा बताई। वे तीनों डाक्टर हंसे। उन्होंने कहा कि ठीक है, तुम जाओ। परीक्षा पूरी हो गयी। वह निकल ही रहा था दरवाजे से तब उसे ख्याल आया कि इतनी मात्रा तो जान ही ले लेगी, यह जहर है! लौटा, और उसने कहा कि क्षमा करें, जितनी मैंने बताई उससे आधी दूंगा! पर डाक्टरों ने कहा कि मरीज अब मर चुका, अब लौटकर किससे कह रहे हो? बात गयी सो गयी। यह परीक्षा ही थोड़े है। अगर मरीज होता और तुमने यह दवा दे दी होती तो मरीज तो मर ही चुका होता, लौटकर किससे क्षमा मांगते? अब अगले वर्ष आना, और तैयारी करो। इस तरह लौटकर वक्तव्य बदले नहीं जा सकते और बदले जायें तो झूठे हो जाते हैं, मरीज तो मर ही जायेगा।
अविचार से मत बोलना—ऐसा अर्थ करो तो उसका अर्थ यह नहीं हुआ कि विचारपूर्वक बोलना। उसका अर्थ मेरे हिसाब में होता है—निर्विचार। क्योंकि जहां विचार हैं, वहां तो गलती हो जायेगी। जहा निर्विचार है, चित्त बिलकुल शात, दर्पण की भांति है, मौन है, शून्य है, जहां ध्यान जगा है—वहां कभी भूल नहीं होती। वहा लौटकर पीछे देखने की जरूरत नहीं पड़ती। वहां कभी पछतावा नहीं होता।
इसलिए मैं इसका अर्थ करता हूं : ध्यानपूर्वक बोलना। जिसको बुद्ध ने सम्यक स्मृति कहा है। जागे हुए बोलना। होश से बोलना। सोच—विचार कर नहीं, क्योंकि सोच—विचार का तो मौका हो या न हो, समय हो या न हो। जिंदगी में समय कहां है? बहुत बार तुम अच्छी बात कहना चाहते हो, नहीं कह पाते, बाद में याद आती है।
पश्चिम का एक बड़ा विचारक, विक्टर ह्यूगो, एक बैठक से आ रहा था। तीन—चार और साहित्यिक साथ थे। कुछ बात चली। एक साहित्यकार ने कुछ कहा—इतना प्यारा वचन था कि विक्टर लुगो के मुंह से निकल गया कि काश, यह मैंने कहा होता! तीसरे साहित्यकार ने कहा. खुगो, मत घबड़ाओ। तुम कहोगे, तुम किसी न किसी दिन कहोगे। आज नहीं कल कहोगे। निकलेगा यह तुम्हारे मुंह से, घबड़ाओ मत। किसी और परिस्थिति में तुम कहोगे, मगर कहोगे जरूर। तुम छोड़ोगे नहीं।
मगर बात तो गयी सो गयी। तुम्हें भी लगता है बहुत बार कि यह बात मैंने कही होती, जैसे किसी ने मेरे शब्द छीन लिए, कि मेरे ओंठ पर आयी बात छीन ली। और कभी तुम्हें लगता है कि काश मैं यह एक शब्द बचा गया होता तो कितनी झंझट बच जाती! क्योंकि कभी—कभी छोटा—सा शब्द पूरे जीवन को रूपांतरण दे सकता है। तुम्हारी दी गयी छोटी—सी गाली तुम्हारे पूरे जीवन को बदल दे, और तुम्हारे मुंह से गिरा हुआ एक मधुर वचन तुम्हारे पूरे जीवन को नया कर दे,’ कुछ कहा नहीं जा सकता। छोटी—सी बात!
अमरीका की एक बहुत बड़ी अभिनेत्री ग्रेटागार्बो बड़ी गरीब स्त्री थी अपने बचपन में। और एक नाईबाड़े में लोगों की दाढ़ी पर साबुन लगाने का काम करती थी। उसने कभी सोचा ही नहीं था कि इतनी बड़ी अभिनेत्री, विश्वप्रसिद्ध अभिनेत्री हो जायेगी। उस नाईबाड़े में एक फिल्म—डायरेक्टर एक दिन बाल बनवाने आया और उसने उसकी दाढ़ी पर साबुन लगाया। जब वह साबुन लगा रही थी, फिल्म निर्देशक था, उसके मुंह से उसके चेहरे को दर्पण में देखकर बस एक शब्द निकल गया कि सुंदर… सुंदर चेहरा है! और उतना ही वचन ग्रेटागार्बो की जिंदगी में क्राति बन गया। दो—दो पैसे में दाढ़ी पर साबुन लगानेवाली स्त्री करोड़ों डालरों की मालिक होकर मरी, उतना—सा वचन। सोचकर कहा भी नहीं गया था, सहज निकल गया था। पर ग्रेटागार्बो को याद आ गयी अपने सौंदर्य की। उसने पहली बार दर्पण में अपने को गौर से देखा। दर्पण के सामने तो रोज खड़ी रहती थी, मगर लोगों की दाढी पर साबुन लगाती रहती थी, कभी खयाल किया ही नहीं था। कभी सोचा भी नहीं था कि मैं सुंदर हूं या सुंदर हो सकती हूं। उस गरीब की इतनी क्षमता भी न थी इतना विचार करने की।
ग्रेटागार्बो ने पूछा. सच, आप कहते हैं मैं सुंदर हूं? उस फिल्म निर्देशक ने कहा कि सुंदर ही नहीं, सुंदरतम स्त्रियों में एक। और यदि तुम चाहो तो मैं प्रमाण जुटा दूंगा, क्योंकि मैं एक फिल्म—निर्देशक हूं मैं एक फिल्म बनाने आया हूं। मैं तुम्हें फिल्म में ले सकता हूं तुम्हारे पास चेहरा है जो फोटोजैनिक है, जो चित्र में इतना सुंदर होकर प्रगट होगा! मैं जिंदगी— भर चित्रों से ही काम करता रहा हूं।
इसलिए कई बार ऐसा हो जाता है कि कोई व्यक्ति, फिल्म अभिनेता, अभिनेत्री, तुम सीधे मिलो तो चाहे इतना सुंदर न मालूम पड़े, उसके पास फोटोजैनिक चेहरा होता है। फोटो में सुंदर आता है, चाहे सामने देखने से सुंदर आये या न आये, ये दोनों अलग बातें हैं। कई बार बहुत सुंदर लोग, सामने देखने पर सुंदर मालूम होते हैं, लेकिन चित्र में उतने सुंदर नहीं रह जाते।
ग्रेटागार्बो उठ गयी आकाश पर। एक छोटी—सी घटना, एक अनायास निकला हुआ शब्द पूरे जीवन को बदल गया; अन्यथा पूरे जीवन शायद लोगों की दाढ़ी पर साबुन लगाते—लगाते मर जाती। एक छोटा—सा शब्द इतनी तरंगें पैदा कर सकता है! मित्र बना सकता है, शत्रु बना सकता है, जीवन को सौंदर्य दे सकता है, कुरूपता दे सकता है।
हबकि न बोलिबा……..।
पर मैं अर्थ करता हूं—यह नहीं कि विचारपूर्वक बोलना। विचार में तो गणित है, चालाकी है, होशियारी है, राजनीति है। मैं कहता हूं : निर्विचार, शात, मौन भाव से बोलना। उठने देना मौन में अंतरतम को। और तब तुम जो बोलोगे वह सम्यक होगा, क्योंकि शांति से जन्मेगा। सम्यकवाणी और तुम थिर हो जाओगे। अन्यथा अहंकार तुम्हें इस अति से उस अति पर ले जायेगा।
हबकि न बोलिबा ठबकि न चालिबा…….
पैर पटक—पटक कर मत चलो। शोरगुल मत करो जिंदगी में। ऐसे गुजर जाओ कि किसी को पता न चले। अनुपस्थित रहो। परमात्मा के होने का ढंग यही है। परमात्मा है, चारों तरफ उपस्थित है, लेकिन पता नहीं चलता। उसकी कला क्या है? ठबकि न चालिबा.. पैर पटक—पटक कर नहीं चलता। आंखों में उंगली डाल—डाल कर तुम्हें दिखाता नहीं कि देखो मुझे।

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