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अहंकार-प्रिंस-सप्तिवरी

चीन में एक बहुत प्राचीन कथा है कि एक लकड़हारा जंगल में लकड़ी काट रहा था। थक गया था। तो नीचे उतर कर लेट गया। उसे एक सपना आया। सपना आया कि पास ही एक खजाना गड़ा है। और वह गया और उसने उघाड़ कर देखा तो निश्चित हंडे गड़े थे। और जरा सी ही धूल ऊपर पड़ी थी। हंडों में हीरे-जवाहरात थे। तो उसने सोचा कि रात आ कर, चुपचाप निकाल कर ले जाऊंगा। अभी निकालूंगा तो फंस जाऊंगा। लकड़हारा, गरीब आदमी! और वह तो करोड़ों की संपदा थी। तो उसने वहां एक लकड़ी गड़ा दी, निशान के लिए। घर लौट आया। रात जब हो गयी, तो वह गया। तो देखा लकड़ी तो गड़ी है, लेकिन हंडे कोई निकाल चुका है। तो वह बड़ा हैरान हुआ। वह लौट आया। और उसने अपनी पत्नी से कहा कि मेरी समझ में नहीं आ रहा है, मैंने सपना देखा या सच है! क्योंकि लकड़ी गड़ी है। इससे सबूत मिलता है कि मैंने सपना नहीं देखा। मैं सच में ही…और हंडे भी थे, क्योंकि अब खड्डे खाली पड़े हैं। वह भी प्रमाण है कि मैंने सपना नहीं देखा। लेकिन हंडे कोई निकाल कर ले गया है।

उसकी पत्नी ने कहा कि तुमने सपना ही देखा होगा। तुमने यह भी सपना देखा होगा कि तुम रात गए, और तुमने लकड़ी गड़ी देखी, और लोग हंडे ले गए। शांति से सो जाओ।

लेकिन एक दूसरे आदमी ने उसी रात सपना देखा था। सपने में उसने भी इन हंडों को गड़े देखा, और एक लकड़हारा लकड़ी गड़ा रहा है। जब उसकी नींद खुली–उस आदमी की–तो वह भागा हुआ जंगल की तरफ गया। सच में वहां लकड़ी गड़ी थी। उसने हंडे निकाल लिए। और वह घर आ गया। घर आ कर उसने भी अपनी पत्नी से कहा, मेरी समझ में नहीं आता कि मैंने सपना देखा या सच में मुझे ऐसा अंतर-दर्शन हुआ। कुछ भी हो, हंडे मैं ले आया हूं। हंडे ये रहे। इसलिए ऐसा लगता है कि मैंने सपना नहीं देखा, सच में ही मैंने इस लकड़हारे को लकड़ी गड़ाते देखा, तभी तो मैं हंडे ले आया।

पत्नी ने कहा कि हंडे तो साफ हैं। और अगर तुमने लकड़हारे को लकड़ी गड़ाते देखा, तो यह उचित नहीं है कि हम इन हंडों को रखें। ये सम्राट को पहुंचा दो। वह जो निर्णय करे।

आदमी भला था, हंडे सम्राट को पहुंचा दिए। तब तक शिकायत लकड़हारे की भी आ गयी थी। सम्राट बड़ा परेशान हुआ। उसने कहा, कुछ भी हो, तुमने दोनों ने सपना देखा है या असलियत में देखा, अब इसका निर्णय कौन करे? एक बात पक्की है कि हंडे हैं। तब इस झंझट में तुम न पड़ो, हंडे मैं आधे-आधे कर देता हूं। उसने हंडे आधे-आधे करके बांट दिए।

रात अपनी पत्नी से कहा कि आज एक बड़ी अदभुत बात हुई। इस तरह के दो आदमियों ने सपने देखे। अब सपने देखे, कि सच, कि झूठ? मगर हंडे थे, तो मैंने बांट दिए। पत्नी ने कहा, तुम चुपचाप सो जाओ। तुमने सपना देखा होगा।

चीन में हजारों साल से इस पर विचार चलता है कि सच में सपना किसने देखा? पर जिंदगी के आखिर में ऐसा ही होता है। जो भी हुआ, सब सपने जैसा हो जाता है। पक्का करना मुश्किल हो जाता है कि असलियत में हंडे थे? कि असलियत में लकड़ी गाड़ी थी? कि असलियत में पति-पत्नी थे, बच्चे थे, मित्र थे, परिवार थे, सुख-संपदा थी, दुख थे, अपने थे, पराए थे, संघर्ष हुआ, प्रतियोगिताएं हुईं? जीते-हारे, सफल-असफल हुए? मरते वक्त हर आदमी के सामने ये सब सपने दोहरते हैं। और उसे तय करना मुश्किल हो जाता है कि ये मैंने सपने देखे, या सच में ऐसा हुआ?

जिन्होंने जाना है, वे कहते हैं, यह खुली आंख का सपना है। आंख खुली है जरूर, लेकिन है सपना। सपना इसलिए है कि इसका उससे कोई भी संबंध नहीं, जो सदा रहता है। यह बीच की भावदशा है। यह बीच का खयाल है। और तुमने जाग कर देखा है या सो कर देखा है, इसमें क्या फर्क पड़ता है? सपने का लक्षण यह है कि अभी है और अभी नहीं है। तो यह जिंदगी भी अभी है और अभी नहीं है। मरते वक्त यह सब खो जाता है।

और इस सपने के भीतर एक और सपना तुम देख रहे हो, जिसका नाम अहंकार है। इन सब सपनों के भीतर तुम अपने को कर्ता मान रहे हो। और तुम बड़े अकड़े हुए हो। और सारी दुनिया को तुम्हारा अहंकार दिखायी पड़ता है, सिर्फ तुम को दिखायी नहीं पड़ता। और उस सारी दुनिया को भी अपने-अपने अहंकार नहीं दिखायी पड़ते। तुम्हारा अहंकार सभी को दिखायी पड़ता है।

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