ऐसा दिन नहीं रहेगा-चन्दन कुमार

ऐसा दिन नहीं रहेगा-चन्दन कुमार

यह कहानी सम्पूर्ण रूप से काल्पनिक हैं और यह कहानी एक अस्सी साल का वृद्ध व्यक्ति एक छोटे से बच्चे को सुनाना शुरू करता हैं|( वह लड़का लगभग दस साल का रहा होगा,और वह लड़का उस वृद्ध व्यक्ति को दादू दादू बुलाता था)- जब मैं आज से पचासों साल पहले तुम्हारी तरह छोटा बच्चा था तो मेरे पिताजी ने मुझे पहली बार मुझे अपने साथ स्कूल ले के गए थे और मेरा दाखिला करवा के आये थे| उस दिन से मेरा जिंदगी का सफ़र शुरू हुआ| मेरे पिताजी गाँव के एक माने गिने और सम्मानित व्यक्ति थे और उनका व्यवसाय भी अच्छा था| धन दौलत की भी कमी नहीं थी| मैं उनका इकलौता पुत्र था मेरे अलावा मेरे घर में सिर्फ मेरी माँ और पिताजी थे| एक वक़्त आया जब मैं दस साल का हो गया और मैं शायद पांचवी कक्षा में था और मेरे एक हिंदी के शिक्षक थे जिनका नाम महेश था वह हमेशा एक बात कहा करते थे ऐसा दिन नहीं रहेगा, पर तुमको सही बताऊ मुझे आज तक इस बात का सही अर्थ मालूम नहीं चला की ऐसा दिन नहीं रहेगा का आखिर मतलब क्या हैं? खैर तुमको आगे बताता हूँ जब मैं दस साल का हुआ तब अचानक मेरे पिताजी बीमार पड़ गए और उनके हाथ में नकद कुछ ही पैसे थे जो जल्दी ही ख़तम हो गए और ओ धीरे धीरे और ज्यादा बीमार होते गए उनका पैसा व्यवसाय में काफी उधार भी फसा पड़ा था| एक दिन शाम का समय था पिताजी का तबियत काफी ख़राब था तो उन्होंने मुझसे कहा की तुम अपने माँ को बुला लाओ| मैं यह सुनकर झट से गया और माँ को बुला लाया| माँ आई और उनके सिर के सामने बैठ गई, पिताजी माँ को देखकर बोले नारू ने मेरे से ३०००० रुपये लिए थे, बोला था जल्द ही लौटा देगा पर लगभग ६ महीने हो गए तुम जाकर पैसे मांगकर देखो क्या कहता हैं? इतना सुनकर माँ चली गई पैसे मांगने पर जब माँ वहा गई तो नारु एकदम से उलट गया की उसने पैसे लिए ही नहीं है ( नारू गाँव का सबसे लालची और चुतिया आदमी था वह हमेशा लोगो को ठग के खाता था खुद से कुछ नहीं करता था परन्तु जो कोई भी काम गाव वालो का कही फस जाता था वह करवा लेता था इस कारन वह आसानी से किसी को फसा लेता था) ये बात सुनकर माँ बोली अगर ओ आपको पैसे नहीं दिए होते तो मुझे थोड़े ही भेजते आपके पास, आज ओ बीमार हैं तभी तो भेजा हैं पैसे के लिए नहीं तो शायद मुझे पता भी नहीं चलता की उन्होंने आपको पैसे उधार दिए, और गाव का कौन नहीं जानता की आप किसीसे न किसीसे पैसे लेते रहते हैं| माँ के इतना बोलने के बाद भी वह आदमी मना कर रहा था की उसने पैसे नहीं लिए और अंत में कहा की अगर उसने पैसे लिए तो पिताजी सबूत दिखाए| इतना सुनकर माँ बोली ठीक हैं मैं जाकर उनको कहती हूँ फिर माँ वहा से आकर पिताजी से पूछने लगी की उन्होंने किनके सामने पैसे दिए, और बोली की नारू पैसे देने से माना कर रहा हैं,और ओ बोल रहा हैं पैसे उसने आपसे लिए ही नहीं हैं ये बात सुनकर पिताजी को जैसे सदमा सा पंहुचा और वह रोने लगे और कहने लगे की जिनके सामने पैसे दिए उनकी तो मौत हो गई| उनके आलावा कोई था भी नहीं जिस दिन पैसे दिए थे तुम अपने मायके थी मैं चाह रहा था की किसी और को बुला लू पर वह मना कर रहा था की अरे एक आदमी तो हैं ही और मैं एक महीने में लौटा दूंगा| इतना कहकर पिताजी चुप हो गए|
इसके बाद रात के लगभग ९ बज रहे थे मैं खाना खा के सो गया सुबह उठा तो देखा पिताजी की तबियत बहुत ख़राब थी| फिर उनको डॉक्टर के पास लेके जाना था और माँ के पास पैसे नहीं थे,और पिताजी की हालत देखकर माँ को कुछ समझ नहीं आ रही  थी| और मैं चाहकर भी कुछ कर नहीं सकता था| पिताजी की तबियत ज्यादा ख़राब होने की कारन माँ ने अपना एक खेत गिरवी रख दिया मात्र ५००० में इसके बाद उनको डॉक्टर के पास ले गए, और इसके बाद ऐसे ही एक एक कर खेत गिरवी रख कर इलाज करवाते रहे और एक समय ऐसा आया की अब कुछ नहीं बचा था| और अंततः पिताजी की भी मौत हो गई| पिताजी के मौत के बाद हमलोगों का जीना बहुत मुश्किल हो गया था माँ के हाथ में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी और पिताजी ने जो नाम बताये थे जिनसे पैसे लेने थे उसमे से ज्यादतर ने मना कर दिया था| और कुछ एक ने थोड़े बहुत दिए जिससे उनकी श्राद्ध हुई| इसके बाद मेरे और माँ का बहुत बुरा हाल था माँ भी क्या करती वह भी बेबस थी आखिर में मेरी माँ ने मजदूरी करना शुरू कर दिया| जो पहले खुद की खेतो में दुसरो को काम करवाती थी आज दुसरो की खेतो में काम करती हैं| इतनी सी उम्र में मैंने ओ सारा कुछ देख लिया था जो एक दस साल के लड़के को नहीं देखना चाहिए था|एक दिन मैं घर के बाहर बैठा था और सोच रहा था क्या करू स्कूल जाऊ या नहीं और अचानक मुझे सर की वो बात याद आई ऐसा दिन नहीं रहेगा| फिर मैंने मन में ठान लिया की मुझे पढना हैं इसके बाद मैं स्कूल फिर से जाने लगा पिताजी के देहांत के बाद| माँ किसी तरह मजदूरी करके चला रही थी| पर मुझे कोई काम नहीं करने देती मुझे ओ सिर्फ बोलती तू पढाई पे ध्यान दे|
अब मुझे हमेशा सर की बात ही याद आती आखिर इसका मतलब क्या हैं ऐसा दिन नहीं रहेगा? क्या मेरा दिन भी बदलेगा? या मैं अब ऐसे ही कष्ट झेलता रहूँगा|
इसके बाद ऐसे ही माँ मुझे मजदूरी करके पढ़ाती रही मैं मैट्रिक में पहुच गया और प्रथम श्रेणी में पास हुआ उस दिन माँ बहुत खुश थी पर मैं खुश नहीं था| मुझे आज भी वैसा ही लग रहा था और सर की बात याद आई ऐसा दिन नहीं रहेगा| एक बार फिर मै सोचने लगा मेरा दिन तो कुछ नहीं बदला फिर सर हमेशा ऐसा क्यों कहते हैं, ऐसा दिन नहीं रहेगा? ( लेकिन एक बात तो थी जो मुझे समझ नहीं आ रहा था पहले मैं कुछ नहीं था आज दसवी पास कर लिया था) बाकि लोगो का रिजल्ट आने के बाद हर कोई इधर उधर घुमने गए पर मैं कही नहीं जा सका क्योकि नहीं पैसे हैं और ना मेरे कोई अपने वैसे अपने तो बहुत थे पर पिताजी के मरने के बाद हर अपना बेगाना हो गया|
रिजल्ट आने के बाद एक महिना तो ऐसे निकल गया अब मुझे आगे की कक्षा में दाखिला लेना था, जो पैसे माँ ने जोड़ जोड़ कर इकठ्ठा किया था ओ मुझे दे दिए दाखिला लेने के लिए और जाकर मैंने दाखिला ले लिया| और इसके दो दिन बाद ही माँ को बुखार हो गई दो तीन दिन से बुखार उतर ही नहीं रहा था मै थोडा दवा लाकर दिया तो थोड़ी सी सुधार हुई, और उसी दिन शाम से जोरदार बारिश शुरू हो गई घर में जो थोड़ी बहुत राशन थी ओ तो ख़त्म हो गई, और माँ के हाथ में पैसे भी नहीं थे अगले दिन सुबह भी वैसे ही बारिश हो रही थी और धीरे धीरे दोपहर हो गई पर बारिश नहीं रुकी घर में खाने को कुछ नहीं था| मै भी भूखा और माँ भी भूखी इसके बाद माँ से मेरी भूख और देखि नहीं गई माँ पड़ोस के किसी घर से जाकर दो ग्लास चावल उधार लाकर भात बनाई, फिर हम दोनों खाए इसके बाद रात को जब मै सोने जा रहा था तो माँ बोली खा ले थोडा चावल हैं और माँ मेरे सामने थाली रख दी| मुझे पता था की इतना ही चावल हैं और माँ बिना खाए ही सो जाएँगी और मुझे इससे ज्यादा टेंशन तो कल की बात सोचकर हो रही थी, की कल क्या होगा? एक तो इतनी तेज बारिश और उसके साथ माँ का तबियत भी अभी थोड़ी सी ही ठीक हुई हैं और घर में कुछ खाने को नहीं है| ये सब सोच सोच कर मेरा मन बहुत दुखी हो गया था तभी मुझे सर की कही बात याद आई ऐसा दिन नहीं रहेगा और फिर मैं मन को थोड़ी तसल्ली दिला कर सोने की कोशिश करने लगा की कभी तो दिन बदलेगा हमारा फिर से और मै कब सो गया पता ही नहीं चला|
सुबह मै गहरी नींद में था तभी अचानक माँ की आवाज कानो में सुनाई दी बेटा उठ जा अब उठकर थोड़ी पढाई कर ले और रात को तूने खाया क्यों नहीं मैंने कोई जबाब नहीं दिया| माँ कुछ कुछ बोलती रही और कुछ देर बाद मैंने पूछा माँ बारिश हो रही हैं? तो माँ ने कहा हां बेटा बहुत तेज हो रही हैं ये सुनकर मन रात की भाती फिर दुखी हो गया, फिर मैं ना चाहते हुए भी उठ कर बैठ गया और सोचने लगा क्या करू आखिर माँ की तबियत भी ख़राब हैं और वह इतनी बारिश में किसका काम करने जाएगी| यही सब सोच रहा था की मैंने देखा कुछ लोग बारिश में मछली पकड़ने जा रहे हैं तो मैंने सोचा मैं भी जाऊं कुछ मैं भी शायद पकड़ लाऊं कुछ तो खाने को हो घर में यही सोचकर घर से निकल कर कुछ देर जाने के बाद अचानक चिकनी मिटटी आ गई और मेरा पैर फिसल गया और मै गिर गया, और जब उठने की कोशिश कर रहा था तो उठ नहीं पा रहा था क्योकि घुटने की हड्डी छटक गई थी इसके बाद कुछ लोग मुझे पकड़ के घर तक छोड़ गए| ये सब देखकर माँ बहुत रो रही थी और माँ के साथ अब मै भी रो रहा था और उस दिन मुझे पूरा बिश्वास हो गया था की इस दुनिया में भगवान नहीं हैं| अगर होता तो हम गरीब को इतनी कष्ट नहीं देते और मेरे आँखों से लगातार पानी बह रहा था| माँ एक कोने में बैठ कर रो रही थी उनको समझ नहीं आ रही थी आखिर करे तो क्या करे घर में खाने को नहीं हैं, तो मेरे पैर दिखाने डॉक्टर के पास कैसे जायेंगे और एक तो ये बारिश ख़तम नहीं हो रहा था| पैर में दर्द भी बहुत हो रहा था दिन भर घर पर ऐसे ही पड़ा रहा कोई देखने तक नहीं आया, और ना पैसे का जोगार हो पाया इतनी बारिश में माँ किसके पास जाएगी पैसे के लिए| माँ बारिश रुकने का इन्तेजार कर रही थी पर बारिश तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था और अब तो रात हो गई रात को बहुत दर्द हो रहा था और मैं जोर जोर से रो रहा था| माँ भी रो रही थी माँ रात भर मेरा सर सहलाती रही पर इससे तो दर्द कम नहीं हो रहा था,और किसी तरह सुबह हुई लेकिन बारिश ख़तम नहीं हुई मैं और मेरी माँ दो दिन रात से भूखे थे| सुबह होते ही माँ पैसे की जोगार करने निकल गई उन सभी लोगो के पास गई जो हमसे हमेशा पैसा उधार लेते थे| पर किसी ने एक फूटी कौड़ी नहीं दी माँ बारिश में भीगते हुए रो रो कर घर आइ, और भगवान को बोल रही थी की हे भगवान् ये कैसा दिन दिखा रहा हैं हमें, अब मैं अपने बेटे का इलाज कैसे करूंगी और दिन ख़तम होने को था पर पैसे का जोगार नहीं हुआ, और मेरा पैर फूलकर उसमे पानी जमा हो गया था और दर्द और ज्यादा बढ़ गया था, और उसके साथ साथ भूख से भी हालत ख़राब लेकिन अब मुझे अपनी दुःख से ज्यदा माँ की चिंता हो रही थी, की अकेली बेचारी किया करेगी फिर किसी तरह ये रात भी गुजार लिए,और सुबह हो गई पर यह सुबह हमारे लिए किसी ख़ुशी से कम नहीं थी| चाहे हम तीन चार दिन से कुछ भी ना खाए हो और शायद आज भी भूखा ही रहना पड़े| लेकिन  आज तीन चार दिन लगातार बारिश के बाद धूप निकली हैं, तो मन में थोड़ी उम्मीद थी की माँ कुछ ना कुछ करके मुझे डॉक्टर के पास लेके जाएगी क्योकिं दर्द मुझसे और सहा नहीं जा रहा था| फिर सुबह होते ही माँ मेरे गाव के एक आदमी से जाकर दो हजार रुपये लेकर आई| मेरे पिताजी की पलंग गिरवी रखकर मुझे किसी तरह डॉक्टर के पास ले गई और प्लास्टर करवा के लाई|
डॉक्टर के पास से आने के बाद माँ के पास सिर्फ ३०० रुपये बचे थे और डॉक्टर ने कहा ये दवाई ख़तम होते ही मुझे फिर एकबार चेक अप के लिए लेके आये| माँ एकबार उस पैसे को देख रही थी और एकबार मेरे तरफ देख रही थी| मैं बिस्तर पर सोया हुआ था भूख से ऐसा लग रहा था की अब जान निकल जाएगी| फिर मैंने माँ की चेहरे की तरफ देखा माँ का चेहरा एकदम छोटा हो गया था| एक तो माँ भुखार से उठी थी और उसके बाद से खाने को कुछ नहीं मिला और तब से आज तक भूखी ही हैं| फिर मैंने ने माँ को अपने पास बुलाया तो माँ मेरे बगल में आके बैठ गई और रोने लगी| माँ को रोते हुए देख अब मैं भी रोने लगा इतना कष्ट मन में कबतक दबा के रख सकता हैं एक इन्सान| फिर मैं रोते हुए माँ को कहा माँ तुम जाओ इसमें से पचास रुपये का कुछ राशन लेकर आओ वरना हम दोनों ऐसे ही मर जायेंगे| जब दवा मंगवाना होगा तब देखेंगे| इसके बाद माँ बोली हां बेटा मैं लाती हु राशन तू बस थोड़ी देर रुक जा मैं बस यूँ गई और यूँ आई| माँ फिर जाकर राशन लाइ और बनाकर मुझे लाके दी फिर माँ और मैंने आज इतने दिनों बाद कुछ खाया|
रात का करीब दो बज रहे थे माँ रो रही थी और उसके साथ ही कुछ बोल रही थी जैसे
खुदा मेरे मैंने ऐसा क्या कर दिया
जो तूने मेरे सारे सुख चैन ले लिया
ख़ुशी मेरी तुमसे क्यों देखा ना गया
पल भर में सारी बगिया उजार दिया
खुदा मेरे मैंने ऐसा क्या कर दिया
जो तूने मेरे सारे सुख चैन ले लिया
कैसे पालू मैं अपनी ये मासूम औलाद
भगवन मेरे मैं तो नहीं हूँ कोई फौलाद
मेरे लाल को भी तूने लाचार बना दिया
ये तो बता दो हमने कसूर क्या किया
जो तुमने सारी सुख चैन ले लिया
कुछ तो बदलेगा हैं बिश्वास एक दिन
…………………………………………….
…………………………………………….. और ये सब बोलते बोलते अचानक सो जाती हैं|
अगले दिन सुबह से फिर बारिश हो रही थी एक बार फिर माँ काम पे नहीं जा सकी और दिन ऐसे ही गुजर रही थी कमाने वाला कोई नहीं, माँ उसी बचे पैसे में से कुछ कुछ लाकर मुझे खिलाती रही और एक दिन ऐसा आया जो पैसा था ओ ख़तम हो गई| और एक बार फिर घर पर राशन नहीं था आज लगभग महीना होने वाला था माँ काम पे नहीं जा सकी और ना मैं दोबारा डॉक्टर के पास जा सका| पैसे ना होने के कारन मैं भी दोबारा कुछ बोला नहीं| एक दिन मैंने ही ओ प्लास्टर निकाल दिया और एक लाठी लेकर धीरे धीरे चलने लगा| अब भी मैं ना स्कूल जा पा रहा था और ना ही कुछ काम कर पा रहा था| कुछ दिनों बाद मैं अब चल फिर रहा था की माँ फिर अचानक बीमार पड गई| हमारे घर को जैसे मुसीबत ने घेर लिया था जबसे पिताजी की मौत हुई थी तब से कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा था|
हर बार की तरह इस बार भी हम दो तीन दिन से भूखे थे और माँ की शरिर बहुत ख़राब थी| दवाई का पैसा भी नहीं था अब मुझे समझ नहीं आ रहा था तो मैंने अपनी घड़ी २०० रुपये में बेच कर माँ के लिए कुछ दवाई लेकर आया पर कुछ बिना खाए दावा कैसे खाती| मैं सोच रहा था की क्या करू पिताजी के मरने के बाद मेरे आस परोस के लोग बात भी नहीं करते थे| फिर भी मैं बेशर्मो की तरह एक घर पर पहुच गया और जाकर एक रोटी माँगा पर उन्होंने कहा की रोटी ख़तम हो गई| इसके बाद दो तीन जगह और गया पर किसीने एक रोटी नहीं दिया| ये सब देखकर मेरा दिल एकदम टूट गया और मैं सोचने लगा यदि माँ मर जाती हैं तो मै क्या करूँगा और मेरी हालत कैसी होगी? ये सोचकर मैं घबरा गया और एक जगह खड़े होकर रो रहा था, तभी एक परोस की गाँव का लड़का उधर से गुजर रहा था जो मेरे क्लास में ही पढता हैं उसने मुझे रोते हुए देखकर रुक गया, और पूछने लगा क्या हुआ ओ मेरा अच्छा दोस्त था| मैं लाचारो की तरह उसको सबकुछ बता दिया ये सब सुनकर ओ भी रोने लगा और उसने मुझे कहा तू जा अपने माँ के पास मैं तेरे पास आधे घंटे तक पहुच रहा हूँ| ये कहकर वह चला गया इतना कुछ सहने के बाद मुझे उसके बातो पे विश्वास नहीं हो रहा था की ओ मेरे लिए कुछ करेगा ओ भी तो मेरे ही उम्र का था| फिर मैं वहा से जा रहा था तो देखा की एक घर में गाय के पास दो रोटी पडी थी| मैंने किसी को कुछ नहीं बोला ओ दो रोटी चुपचाप उठा लिया पर ओ रोटी ताज़ी नहीं थी फिर भी मैंने सोचा कमसे कम इसे खाकर दवा तो खा सकती है| रोटी से बदबू आ रही थी और मैं बहुत रो रहा था की ये रोटी माँ को कैसे दूंगा| फिर मैं ना चाहकर भी ओ रोटी माँ को जाकर दे दिया और माँ ने कुछ बिना बोले ही वह रोटी खाकर दवा खा ली पर मुझे एक बार भी खाने के लिए नहीं बोली शायद यह पहली बार थी की माँ ने मुझे खाने के लिए नहीं बोला| शायद माँ को पता चल गया की ये रोटी मैं नहीं खा सकता| माँ ने रोटी खाकर दावा तो खा ली पर उनके आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे|
हो सकता हैं माँ जल्दी ठीक होना चाह रही थी ताकि ओ कुछ काम कर सके| मैं माँ के पास ही बैठा था की मेरा वह दोस्त आया अपने पापा के साथ और साथ में खाने का सामान के साथ साथ रोटी चावल भी लेकर आया और मुझे उनके पिताजी बोलने लगे बेटा तुमको किसी भी चीज की जरुरत हो तो तुम मेरे घर आ जाना, तुमको सबकुछ मिल जायेगा और यहाँ दो महीने का राशन हैं ये ख़तम हो जाये तो और मंगा लेना और बेटा अपनी माँ का ध्यान रखना, ताकि ओ जल्दी ठीक हो| मेरा ओ दोस्त मेरे साथ ही बैठा था और मुझे दिलासा दे रहा था| अब मुझे लगा की दुनिया में कोई तो हैं जो गरीबो के लिए सोचता हैं और मैं मन ही मन उसको भगवान् मानने लगा|
इसके बाद लगभग दो महीने बाद  मैं और माँ घर साफ़ कर रहे थे तो मुझे एक पासबुक मिला जिसमे पचास हजार रुपये जमा था पर मुझे पता नहीं था की इसमें अभी पैसे हैं या नहीं| पासबुक देखकर माँ ने पूछा ये क्या हैं फिर मैंने बताया एक पासबुक हैं ये सुनकर फिर माँ बोली अरे शायद ये वही पासबुक हैं जिसके बारे में तेरे पिताजी बोल रहे थे| इसमें पैसे हैं उन्होंने नहीं निकाला था मुझे बताके गए हैं| देखो कितने दिन हो गए मुझे इसके बारे में कुछ भी याद नहीं था| माँ की बात सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई की इसमें पैसे अभी भी जमा हैं| लेकिन इसमें अब हमने कोई बात नहीं की और हम अपने काम में लग गए| घर अच्छी तरह साफ़ करने के बाद मैं और माँ खाना खा रहे थे तो मैंने माँ को बोला माँ अगर हम पैसे निकालकर एक छोटी सी दूकान खोल दे तो अच्छा नहीं होगा| तुम दुकान चलाना कमसे कम लोगो के खेतो में तो जाना नहीं पड़ेगा| मेरी बात सुनकर माँ खुश गयी और बोली बात सही है तेरा, बेटा चल ऐसा ही करते हैं कल बैंक से जाकर पैसे निकाल कर लाती हूँ|
अगले दिन मैं और माँ जब बैंक गए तो वहा जाकर पता चला की बैंक में अभी एक लाख दस हजार रुपये के करीब हैं फिर हमने तीस हजार रुपये निकाले और घर आ गए और हमने लगभग एक हफ्ते के अन्दर दुकान खोल दी| पहले कुछ दिन तो थोड़े बहुत ही लोग आ रहे थे पर बाद में दुकान चलने लगा| कुछ लोग उधार मांगने आये थे मैंने उनको साफ़ मना कर दिया मेरी माँ बोल रही थी के दे दो पर मैंने मना कर दिया की नहीं देना| फिर माँ ने कहा दे दे दिन सबका एक जैसा नहीं रहता इस दुनिया को चलाने वाले भगवान उन्होंने ने सबको दुःख सुख दे रखा हैं और सबके लिए कोई ना कोई इसी दुनिया में रखा हैं जो उसकी मदद करेगा| जैसे तेरे दोस्त ने हमारी की थी तो ऐसा ही आज तू नहीं देगा तो कोई नहीं, हो सकता हैं आज भूखा रहे पर भगवन ने जिसको इस दुनिया में भेजा हैं उसके लिए कुछ ना कुछ तो जरुर सोच के रखा हैं| माँ की बात सुनकर मेरा दिल भर आया और मैंने सबको राशन दे दिया और मुझे मेरे शिक्षक की बात याद आयी की ऐसा दिन नहीं रहेगा फिर मुझे थोड़ी ख़ुशी हुई की सर सही बोलते थे की ऐसा दिन नहीं रहता हैं|
फिर धीरे धीरे हमारा यही छोटा सा दुकान और बड़ा हो गया और लगभग चार साल बाद मैंने दो एग्जाम दिए थे एक शिक्षक का और एक रेलवे का और दोनों निकल गए फिर मैंने शिक्षक ही ज्वाइन किया क्योकि मुझे पढाना ठीक लगता था|
आज मेरे पास पैसों की कमी नहीं हैं मेरे दो बेटे हैं, पर मैं अब ठीक से चल नहीं सकता और मेरे बेटे मुझे सिर्फ दो टाइम खाना खिलाते हैं तो आज मुझे सर की बात पूरी तरह समझ में आया समय चाहे जैसा भी हो किसीका एक सा नहीं रहेगा| यही हैं मेरी कहानी………ऐसा दिन नहीं रहेगा |||||||

 

चन्दन कुमार

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