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अनमोल रिश्ता-कवि-प्रकाश-प्रीतम

रिश्ता क्या है क्यों बनता है इससे क्या मिलता है मन में कभी कभी यह प्रश्न उठता है
जो भी हो लेकिन रिश्ता, रिश्ता होता है।
यह प्रेम के सागर से प्रारम्भ होकर रिस्ते में परिवर्तित हो जाता है जिसमे दो व्यक्तियों का परस्पर प्रेम समाहित होता है।
यदि प्रेम न हो तो रिश्ता अधिक समय तक टिक नहीं सकता क्योंकि रिश्ता प्रेम पर ही केंद्रित होता है प्रेम कुम्हार के चाक कि वह धुरी है जिस पर प्रेमी रूपी कुम्हार प्रेम रूपी मिटटी को एक सुन्दर आकृति में निर्मित कर देता है। जिसे सम्भाल कर रखने की जरूरत पड़ती है। यदि उसे सम्भाल कर न रखा जाये तो वह चटक सकता है।
कभी कभी इंसान मिटटी के बने बर्तन को सस्ती वस्तु समझ कर कद्र नही करते और सोचते हैं क्योकि वह यह सोचते हैं कि इसकी मूल्य अधिक नही है इसे तो दुबारा से खरीद लेंगे।
किंन्तु उस व्यक्ति को यह नही पता कि मैं दुबारा से जो बर्तन खरीदूंगा वह पूर्व के बर्तन की तरह तो होगा लेकिन उसकी कीमत हमे फिर से चुकानी पड़ेगी और जरूरी नही की दुबारा खरीद कर लाया हुवा बर्तन पहले वाले वर्तन कि तरह ही पका हुवा हो।
रिस्ते कि भी यही स्थित होती है हमे दुबारा तो रिस्ते मिल जाते हैं और काम भी चलता रहता है किंतु जरूरी नही कि वह ब्यक्ति जिससे हम दुबारा से रिश्ता स्थापित किये हैं वह उतना ही सक्षम हो रिस्ते निभाने में जितना पूर्व वाला था। यदि हमें परखने की गुणवत्ता नही मालूम तो वह उससे भी बुरा व्यवहार कर सकता है।
जहाँ रिस्ते होते हैं वहाँ बात होती है प्रेम होता है यह निश्चित है लेकिन यह नही हो सकता कि हर कोई बात करे और प्रेम करे।
बात वह बात नही कि जिससे हम रिस्ते बदल दें बात वह है जिससे हम बुराई को बदल सके न कि रिस्ते।

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