असमंजस-रोहित कुमार

असमंजस-रोहित कुमार

” उस समय जब मैं जा रहा था तो मैं घर से बाजार की तरफ क्योंकि उस दिन मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं थी और घर पर मेरा भाई – बहन नहीं थें तो खुद ही दवाइयां लेने चला गया कुछ दूरी है दवाई की दुकान थी तो मैं जा ही रहा था कि अचानक से तेज बारिश होने लगी और कुछ ही पल में मैं पूरी तरह से भीग गया तो मैं सोचा कुछ समय कहीं पर रुक जाऊँ और बारिश को रुकने का इन्तेजार करूँ और एक तरफ ऐसा लग रहा था कि शायद ये सही नहीं होगा क्योंकि कोई अनजान को देखकर कोई भी गलत सोचेगा यही सब दिमाग मे चल रहा था और मैं भी धीरे – धीरे आगे बढ़ते जा रहा था कि सामने एक घर दिखाई दिया तो मैं रुक जाना ही उचीत समझा क्योंकि बारिश और तेज होती ही जा रही थी तो मन में उठ रहे उथल- पुथल को भूल कर मैं दरवाजे के पास जाकर आवाज लगाया एक दो बार आवाज लगाने के बाद ऐसा लगा की कोई आ रहा है कुछ पल ही अंदर से एक महिला का आवाज आया और पूछा गया कि ‘कौन हैं’ मैं कुछ पल सोचा और बोलने ही वाला था कि फिर से आवाज आई और फिर मैं विनम्र भाव से उनसे दरवाजा खोलने के लिए निवेदन किया तो कुछ पल में दरवाजा खोला गया तो मैं जो देखा उससे हतप्रभ हो गया एक पल में ऐसा लगा जैसे आज के समय में ये क्या हो गया है। मैंने देखा कि महिला डरी-डरी सी है और अपने हाथ में कुछ लिए है देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो कितने डरे-डरे से दरवाजा खोलें हैं और उस पल मैं सच में अकथनीय हो गया, और तब तक बारिश भी रुक गयी थी तो मैं उनसे ये कह कर चला गया कि आज हमारे समाज में भले ही बुरे लोगो की तादाद बढ़ गयी है लेकिन अच्छे लोग भी हैं , धन्यवाद …….”।

 

Rohit Kumar रोहित कुमार
  गया, बिहार

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