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अवरुद्ध सृजन-कृष्ण मुरारी

कमल जी को साहित्य लिखना पसंद था। ये उसके पेशे में नहीं थे,और ना ही शौक में शामिल थे। बस अपने मन का कुछ लिखने में उन्हें आनंद की अनुभूति होती थी – एक विचित्र आनंद। जब भी वो लिखने बैठते, उन्हें खुद ज्ञात नहीं होते कि वो आज क्या लिखने जा रहे। कलम अपने आप कोरे -कागज पे रेंगते रहते एवं अंततः एक लेख तैयार हो जाता। वे कभी कोई कविताएं लिखते,तो कभी कहानियां।
हालांकि पेशे से कमल जी एक ब्लॉक एग्रीकल्चर ऑफिसर थे – बी ए ओ, लेकिन साहित्य लेखन में उनकी काफी रुचि थी। अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों ही भाषाओं में लिखते थे, कमल जी। जब भी वो लिखने बैठते , अपने आस पास की दुनियां को बिल्कुल ही भूल जाते जैसे। और शायद ही कोई ऐसे दिन गुजरते, जिस दिन वो कोई कहानी या कविता बिना लिखे रह जाते।
सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक तो वो अपने कार्यालयीन कार्यों में लगभग पूर्णतः व्यस्त रहते। और फिर मित्रों के संग गुफ्तगू करने में, एक दो घंटे निकल जाते। लेकिन इन सब कार्यों के बाबजूद ,वो समय निकालकर देर रात्रि ही सही, किन्तु बिना कुछ लिखे सो नहीं पाते। लिखने की तमन्ना दिल में आने से ही उसके मन मस्तिष्क मानो एकदम से तरोताजा हो उठते।
जब वो लिखने में मशगूल होते, तो ऐसे लगते मानो उन्हें परमानंद की प्राप्ति हो रही होती। इस दुनियां में लेखन के कार्यों से अधिक उन्हें किसी अन्य कार्य में उतनी दिलचस्पी कभी नहीं रही। जैसे एक नागमणी सर्प अपने मणि को अर्द्धरात्रि में सबसे छुपाकर निकाल लेता है,एवं आसपास नाचने लगता है, किन्तु उस मणि को किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहता ,उसी प्रकार जब उसकी लेखिनी कागज पे दौड़ती , तो कमल को ऐसे प्रतीत होते, जैसे वो एक अनन्त आनंद के सागर की गहराईयों में उतरते चले जाते – पूर्ण निर्बाध एव निर्विरोध ,कोई छोटी सी आहट भी उन्हें उद्विग्न कर देती उस वक्त।
कई बार उन्हें ये बातें भी सालती, कि काश उन्होंने सिर्फ लेखन कार्य को ही तरजीह दी होती प्रारंभ से, और उन्हें इसके अलावा अन्य कुछ भी नहीं करने पड़ते। उनके सारे वक्त सिर्फ एवं सिर्फ सुंदर लेख में ही व्यतीत होते, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए, शायद इसलिए कि लेखन धनोपार्जन का जरिया नहीं हो सकता खासकर नए लेखकों की खातिर,ऐसा उनका मानना रहा था।

                          इतनी सर्वोत्कृष्ट लेखिनी थी, कि उनकी प्रत्येक रचनाएं साहित्य जगत में मौजूद शीर्षकारों को एक गहन एवं गंभीर चिंतन के लिए विवश कर देती। हर जगह विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में उनकी रचनाओं की विवेचना करते हुए विद्वानजन अवश्य नजर आ जाते। कई लोग उनकी सर्वोत्कृष्ट लेखन को उनके  कालान्तर     जीवन में मिले दर्द को श्रेय देते थे, किन्तु किस प्रकार के कष्टों ने उन्हें घेर रखा था, इसका अंदाजा शायद किसी को भी नहीं था।
               अबतक कमल जी अपने परिवार से दूर शहर में रहते थे,एवं उनकी पत्नी और बच्चे गांव में उनके माता- पिता के साथ रहते थे। दो मास पूर्व ही उनकी मां का स्वर्गवास हो गया। जहां अबतक उनके  बच्चे जो गांव के छोटे कॉन्वेंट स्कूल में नामांकित थे,उन्हें अब वो शहर ले आए । हजारीबाग शहर  में उनकी पोस्टिंग थीं,अतः अब वो अपने पिताजी को भी साथ लेकर हजारीबाग ही आ गए ,सपरिवार। पिताजी की इच्छा को ध्यान में रखते हुए एवं बच्चो के बेहतर भविष्य ने उन्हें परिवार के साथ रहने की  ओर प्रेरित किया । साथ ही कई सालों से उनकी भी तमन्ना थी कि परिवार के साथ ही रहा जाए ताकि भोजन आदि की व्यवस्था से भी कुछ  निश्चिंत रह सकें एवं लिखने के लिए पर्याप्त समय में भी बढ़ोतरी हो सके, वरना काफी वक्त उनके भोजन बनाने एवं कपड़ों की तैयारी में चले जाते। और फिर मां के कहे अल्फ़ाज़ कि परिवार के साथ नमक रोटी भी एक अलग आनंद की अनुभूति देते है,उन्हें बारम्बार परिवार के साथ ही रहने को बाध्य करते। उसी मां  के लिए उन्होंने एवं उनकी पत्नी सुरेखा ने महत्त्वपूर्ण  त्याग किए थे अबतक।
                    सुरेखा के साथ वो प्रथम बार साथ थे। पहले जहां सुरेखा हरवक्त एक शिकायत में रहा करती थीं उनसे- परिवार की समस्याओं को लेकर, अब उन दोनों के मध्य कोई गिले -शिकवे बिल्कुल ही न रहे।  समय से सुरेखा हर जरूरत को पूरा कर देती एवं सदा ही अपने मुस्कुराते हुए अंदाज में कमल जी  का साथ देती, किसी भी बात में। कमल जी ने जब सोचा कि उन्हें शहर ले जाएं, तो उनके दिल में इस आशंकाओं ने जन्म ले लिए  कि शायद उसके एवं कमल की जिद कहीं उनके प्यार एवं स्नेह में एक दीवार न हो जाए । क्योंकि अबतक दोनों अपनी -अपनी विभिन्न विचारधाराओं के साथ ही समय गुजारते थे,जहां कई बार उनके बीच छोटी- मोटी बातों को लेकर कुछ अशांति एवं कलह की स्थिति पैदा हो जाती। लेकिन जबसे सुरेखा शहर आई उसने मानो कमल जी को अपना सर्वस्व मान लिया था, एवं उसकी बातों को बिना किसी लाग- लपेट के अक्षरशः पालन करने लगी थी।
                     परिणास्वरूप दोनों के आपसी संबंधों में, अब एक अगाध प्रेम एवं समर्पण के नवांकुरण की प्रस्फुटन हो गई । कमल जी ने खुद भी ये महसूस किया कि पहले, वो भी सुरेखा को कभी- कभी अनजाने में ही नजरअंदाज कर उसके कोप का भाजन बन  जाते। किन्तु अब उनके मध्य जिद्द  एवं सिद्धांतों की दीवार पूर्णतया विलुप्त हो गई । कमल जी के दिल में सुरेखा के समर्पण  एवं इस परिवर्तित कुशल  व्यवहार ने एक अमिट छाप छोड़ दी । ये वक्त कमल जी  की जिंदगी के लिए अतुलनीय एवं बेहद महत्त्वपूर्ण पलों में से थे। 

उनके आनंद की कोई सीमा ही न रही। तपती मरुभूमि में कमल जी को मानो शीतल जल के असंख्य गहरे तालाब, उपहारस्वरूप प्रदत्त हो गए थे- सुरेखा के प्रेम एवं स्नेह के रूप में। कमल जी का हृदय एक सम्पूर्ण तथा अक्षुण्ण आनंद से ओत -प्रोत हो था शायद प्रथम बार।
एक दो दिन तक तो विभिन्न गृह कार्यों की वजह से ,कमल जी बहुत व्यस्त रहे। नए जगह में नवीन घर बसाने के अरमानों ने उनके कीमती वक्त को किसी अजगर की भांति निगल गए और इस दौरान वो कुछ भी लिखने में पूर्णतः असमर्थ रहे। मन न होने के बाबजूद तीसरे दिन उन्होंने निश्चय किए कि ,आज उन्हें एक कहानी अवश्य ही लिखनी है……।
पूर्व की भांति ही उन्होंने कागज कलम हाथों में थामे ,एवं लिखने बैठ गए…..।

रात्रि के 11 बज गए थे ,चारों तरफ गहन अंधेरा था। साथ ही एक मस्त सन्नाटा भी जो उन्हें लिखने के उपर्युक्त वातावरण प्रदान कर रहे थे। लिखने वक्त उन्हें सिर्फ यही एक चीज की आवश्यकता होती। करीब आधे घंटे तक कमल जी सोचते रह गए ……। किन्तु आज उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहे थे। पहले जहां वो लिखने बैठते थे, तो कलम खुद ब खुद रेंगने लगती। और कई बार मात्र आधे घंटे के अल्प समयांतराल में ही उनकी रचनाएं धड़ाधड़ पूरी हो जाती।
आज क्या हो गया? कुछ भी तो नहीं सूझ रहे थे। ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो ये लेखन कार्य उनके बस की बात नही,और ये एक महज बोरिंग कार्य हो। ना जाने लोग क्या लिखते हैं और क्यों?, जरूरत क्या है लिखने की? सब कुछ तो पहले लिखे जा चुके हैं, लेखन एक पुनरावृति मात्र तो है।
शब्दों के इस अद्वितीय शिल्पकार के सारे शब्द अचानक ही कहीं शून्य में विलीन हो गए थे। आखिर क्यों? क्यों कुछ भी नहीं आ रहे मस्तिष्क में? ये शून्यता क्या बतला रही आखिर…….?
कमल जी का मन एक गहन चिंतन में डूबता जा रहा था।

बहुत देर पश्चात उन्हें जैसे पूर्ण जवाब मिल गए थे…….

उन्हें ये लगा की उनके दिल के अंतर्मन में वेदना का अभाव ही था ये, अन्य कुछ भी नहीं। उन्होंने महसूस किए कि दर्द की स्याही अति – आवश्यक होती हैं किसी भी रचनाओं की तह तक जाने के लिए।
उनके हृदय की प्रफुल्लता ही, उनके लेखन में बाधक बनकर उनके नवसृजन को अवरूद्ध कर रही थी……..।
कृष्ण मुरारी

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