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अवसर-प्रिंस स्प्तिवारी

चीन की एक बड़ी पुरानी कथा है। एक वजीर को सम्राट ने फांसी की सजा दे दी। नाराज हो गया था, कुछ बात ऐसी हो गई। ऐसे वजीर से प्रेम भी बहुत था, लेकिन राजा तो राजा थे। जरा—सी बात हो गई और इतना नाराज हो गया कि नाराजगी में कह दिया कि फासी लगा दो। सात दिन बाद फासी लग जाए। लेकिन नियम था उस राज्य का कि फासी के एक दिन पहले सम्राट जिस को भी फासी होती थी उससे मिलने जाता था। फिर यह तो उसका वजीर था। तो वह गया मिलने।

वजीर बहादुर आदमी था, अनेक युद्धों में लड़ा था, छाती पर बड़े घाव थे उसके। कभी उसकी आंख में आंसू नहीं देखा गया था। राजा को देखते ही उसकी आंख से आंसू झर—झर गिरने लगे। राजा ने कहा— आश्चर्य! क्या तुम मृत्यु से ड़र गए हो? मैं तुम्हें जन्म भर से जानता हूं र तुम जैसा हिम्मतवर आदमी इस राज्य में दूसरा नहीं, तुम्हें मैंने कभी रोते नहीं देखा, तुम रो क्यों रहे हो? बात क्या है? तुम कहो मुझसे, बात क्या है? उसने कहा—कुछ भी बात नहीं, अब कहने से कुछ सार नहीं। अब जो हो गया हो गया। लेकिन मैं मौत के कारण नहीं रो रहा हूं र मैं तुम्हारे घोड़े के कारण रो रहा हूं। वह जो घोड़ा सम्राट चढ़कर आया है। बाहर बौध दिया है, सींखचों से दिखाई पड़ रहा है। सम्राट ने कहा—घोड़े के कारण? घोड़े के कारण क्यों रोओगे तुम? पहेली मत बूझो, मुझे बात सीधी—सीधी कहो। वजीर ने कहा—अब आप नहीं मानते तो कहे देता हूं। मैंने जिंदगी भर एक कला सीखी, बड़ी मेहनत से कला सीखी कि मैं घोड़े को आकाश में उड़ना सिखा सकता हूं। मगर एक खास जाति के घोड़े को ही वह उड़ना सिखाया जा सकता है, और वह घोड़ा मुझे न मिला सो न मिला। आज जब कि मरने का दिन आ गया, यह घोड़ा सामने खड़ा है! आप जिस घोड़े पर बैठ कर आए हैं, इसकी मैं तलाश में जिंदगी भर से था। इस जाति का घोड़ा उड़ना सीख सकता है। सम्राट को तो आकांक्षा जगी कि अगर घोड़ा उड़ना सीख जाए! तो उन दिनों तो घोड़ा सबसे बड़ी ताकत थी, और अगर घोड़ा उड़ता हो, तब तो कहना क्या? तो यह सम्राट का साम्राज्य सारे जगत में फैल जाएगा। उसने कहा, तू फिकिर मत कर, कितना समय लगेग घोड़े को उड़ना सीखने में? वजीर ने कहा—एक साल लगेगा । सम्राट ने कहा—तों एक साल के लिए तुझे हम जेल से बाहर निकाल लेते हैं। अगर घोड़ा उड़ना सीख गया तो आधा राज्य भी तुझे दूंगा और अपनी बेटी से विवाह भी कर दूंगा। और अगर घोड़ा उड़ना नहीं सीखा, तो ठीक है, अभी सूली लगती है, साल भर बाद लग जाएगी।

वजीर तो उस घोड़े पर बैठकर अपने घर लौट आया। घर तो पत्नी रो रही थी, बच्चे रो रहे थे, मां रो रही थी, बाप रो रहा था, कि आखिरी दिन आ गया और अभी तक कुछ आसार नहीं है क्षमा के। बेटे को लौटा देखकर बाप तो समझ ही नहीं सका। पत्नी तो एकदम दीवानी हो गई खुशी में। सबने घेर लिया कि कैसे बचे? क्या हुआ? वह हंसा और उसने कहा कि ऐसे बचा, ये घटना घटी। पत्नी और जोर से रोने लगी, मां और छाती पीटने लगी, उसने कहा—तुमने यह क्या किया? हमें सब पता है कि तुम्हें कुछ पता नहीं, तुम उड़ना कुछ सिखा नहीं सकते घोड़े को। तुमने कब सीखा? कहां सीखा? इसकी तुमने कभी बात ही नहीं की। उस वजीर ने कहा—मैं कुछ जानता नहीं घोड़ा उड़ने इत्यादि के संबंध में, यह तो एक कहानी गढ़ी है। उन्होंने कहा अब मुझे यह और मुसीबत में डाल दिया। ये सात दिन हमारे इतने कष्ट से कटे हैं, अब यह साल और कष्ट से कटेगा। इससे तो बेहतर था तुम मर ही जाते। हमें लटका दिया फांसी पर साल भर के लिए और। और अगर मांगा ही था तो कम से कम दस साल तो मांगते। उस वजीर ने कहा—पागल हो गए हो! एक साल का क्या भरोसा? राजा मर सकता है, मैं मर सकता हूं, और कम से कम घोड़ा तो मर ही सकता है। एक साल का भरोसा क्या है? कुछ भी हो सकता है। फिकिर न करो!

और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा हुआ कि तीनों ही मर गए। राजा भी मर गया, वजीर भी मर गया, घोड़ा भी मर गया।

निशा गुजरी हुई घड़ियों का लेकिन फिर नहीं मिलता

तुम्हारे भीतर फूल खिलने शुरू हुए हैं। अवसर मत चूको! झुकने की आकांक्षा है तो झुक ही जाओ! फिर झुके तो उठना क्या? संन्यास का इतना ही तो अर्थ है, झुके तो झुके, फिर उठना क्या?

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