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बली का बकरा – नेहा कुमारी

एक नगर में एक राजा रहता था। ईश्वर की कृपा से राजा के राज में किसी भी चीज की कोई भी कमी नहीं थी। लेकिन, फ़िर भी राजा-रानी हमेशा दुखी रहते थे क्योंकि वो निसन्तान थे। एक दिन रानी कुलदेवी के मन्दिर में पूजा करने गई और उन्होंने कहा- हे माँ अगर हमें कोई भी पुत्र होगा तो मै एक बकरे का बली दूगी। कुछ समय बाद रानी एक पुत्र को जन्म दी। यह शुभ समाचार सुन कर सभी बहुत खुश हुआ।और सभी मिलकर खुशियाँ मनाई। कुछ समय बाद एक दिन रानी ने राजा से कही- महराज मैंने कुलदेवी माँ से एक मनोकामना माँगी थी।और जिसके लिये एक बकरे की बली देना होगा। और मेरी मनोकामना पुरी हो गई।इसलिए मै चाहती हूँ, कि आप मेरे साथ चले और भागीदार बने।यह सब सुनने के बाद राजा बोला -हे रानी हम राजा है एक ही क्यों? हम एक सौ आठ बकरे का बली देगे। और राजा ने अपने सैनिक को आदेश दिया कि मन्दिर में एक सौ आठ बकरे का बली दिया जाय। इस के बाद राजा के आज्ञा अनुसार एक-एक करके बकरे का बली दिया जा रहा था।जब निनान्वे बकरे का बली पर गया था। तो सौवाँ बकरा मनुष्य के अवाज में हँस रहा था यह देख सभी आश्चर्यचकित हो गया। यह सुचना जब राजा को मिला।तो वो भी आश्चर्यचकित रह गया।और तुरन्त उस बकरे के पास गया और बोला तुम एक बकरा होते हुए भी मनुष्य के अवाज में क्यों हँस रहे हो? इस समय तो तुम्हे दुखी रहना चाहिए क्योंकि तुम्हारा बली पर रहा है,लेकिन तुम तो खुश हो रहे हो। इसका क्या कारण है मुझे बताओ? यह सब सुनने के बाद बकरा बोला -तुम नहीं समझ सकोगे । जो मैं क्यों हँस रहा हूँ और इसके पीछे क्या कारण है? तुम अपना काम करो।बली देना है दो। राजा फ़िर बकरा से बहुत ही आग्रह किया और कहा जबतक आप हमें हँसने का कारण नहीं बताते तबतक मैं यहीं रहुगा।कहीं भी नहीं जाऊँगा। इसके बाद बकरा बोला -तो सुनो एक समय की बात हैं।मुझे कोई सन्तान नहीं था।एक दिन मेरी पत्नी मन्दिर में पूजा करने गई और उन्होंने मनोकामना माँगी थी कि अगर हमें कोई सन्तान होगा तो मैं एक बकरे का बली दूगी और मुझे एक पुत्र हुआ।मैं अपने पत्नी के कहने पर एक दिन एक बकरे का बली दिया।जिसके कारण मुझे सौ जन्म बली का बकरा बनना परा है। जिसमे से मेरा निनान्वे जन्म बली पर चुका है और यह सौवाँ जन्म है।इसलिए खुशी से हँस रहा हूँ ।क्योंकि इसके बाद बली का बकरा नहीं बनना पड़ेगा। और मुझे इस योनि से मुक्ति मिल जाएगा।यह सब सुनने के बाद राजा को तो गहरा असर परा।और वह सोचने लगा कि अगर यह एक बकरे का बली दिया तो सौ जन्म बली का बकरा बनना परा है।तो मुझे कितना जन्म बली का बकरा बनना परेगा?इसके बाद राजा ने अपने नगर में घोषना करवाँया कि आज के बाद कोई भी बली नहीं देगा।इस आज्ञा को जो नहीं मानेगा।उसे उचित डंड दिया जाऐगा।और बाकी बचे बकरे को छोर दिया। इसके बाद राजा के राज्य में बली प्रथा खत्म हो गयी। वैसे देखा जाए तो हमेंसा यही होता आ रहा है।जो हमसे अधिक शक्तिशाली होता है।उनसे हम भयभीत होते हैं और जो हमसे कमजोर होता है उन्हें हम भयभीत करते हैं।आखिर क्यों हम दूसरे जीव के दुख को देख दुखी नहीं होते हैं।हमारे अन्दर का इन्सानित्य कहा खो गया।

नेहा कुमारी
दरभंगा,(बिहार)

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Ravi Kumar

Ravi Kumar

मैं रवि कुमार गुरुग्राम हरियाणा का निवासी हूँ | मैं श्रंगार रस का कवि हूँ | मैं साहित्य लाइव में संपादक के रूप में कार्य कर रहा हूँ |

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