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भारतीय धार्मिक राजनीति-ऋषिकेश-सिंह

भारत….. एक ऐसा देश जो अनेक विविधताओं,अनेक धर्मो ,अनेक जातियों में विभक्त होने के बावजूद भी अनेकता में एकता रखता है। भारत एक ऐसा देश है जहां एक महाद्वीप के सारे तत्व, गुण एवं विविधता उपलब्ध है। इसी कारण इसे एक उपमहाद्वीप कि संज्ञा दी गई है।
जब हमारा देश आजाद हुआ और देश को चलाने के लिए संविधान बनाया गया तो देश की विविधता एवं संविधान की खूबियों को देखते हुवे पश्चिमोत्तर देशों ने ये अनुमान लगाया की इस संविधान की वजह से भारत का लोकतंत्र ठीक से नहीं चल पाएगा और इसका विभाजन कई छोटे छोटे देशों में हो जाएगा लेकिन हमने और हमारे संविधान ने इस बात गलत साबित किया आज देश को आजाद हुवे 72साल से ज्यादा हो गया और देश की जनता इसी संविधान की वजह से एकता के सूत्र में बंधी हुई है।
लेकिन पिछले कुछ दिनों से धर्म की जों राजनीति शुरू हुई है वो कहीं न कहीं इस एकता को खंडित करने का कार्य करती है। चाहे वो मथुरा की घटना जिसमें मंदिर में नमाज़ पढ़ने का हो या फिर महजीद में जाकर हनुमान चालीसा पढ़ने कि बात हो।या फिर हम कह सकते है कौन बनेगा करोड़पति में पूछेंगे गए एक सवाल पर राजनीति करके।
ये सारी बाते कहीं न कहीं देश की एकता को खंडित कर रहे है। अर्थात् हमे ये सोचना चाहिए कि क्या वास्तव में धर्म हमें औरों से बैर करना सिखाता है। जाहिर सी बात है जवाब होगा नहीं। क्युकी कोई भी धर्म का जानकार होगा तो उसे पता होगा की धर्म तो आपस में बैर करना सिखाता है ही नहीं ।फिर चाहे वो कोई भी धर्म क्यों न हो।
महाभारत में श्री कृष्ण ने धर्म को परिभाषित करते हुवे कहा कि ” धरती धारयती वां लोंक इती धर्मह” यानी लोक कल्याण के साथ जन्म लेना ही धर्म है।
आगे चलकर तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में धर्म को परिभाषित किया की ” परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपिडा सम नहीं अधमाई” यानी दूसरों के हित से बढ़कर कोई धर्म नहीं है और दूसरो को पीड़ा पहुंचाने से बढ़कर कोई अधर्म नहीं है।
आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने भी कहा कि ” धर्म विहीन राजनीति साड़ी हुई लाश के समान है”
यानी हम कह सकते है कि धर्म का आशय नैतिकता से है मजहब से नहीं।
ऋषिकेश सिंह लप्पु

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